Mahamana Madan Mohan Malaviya

Mahamana Madan Mohan Malaviya
Speeches & Writings

भारत की  दशा पर

(विलायत से लौटने पर वाइसराय को लिखा गया पत्र)

बिड़ला हाउस, बम्बई

२९ जनवरी, १९३२

 

      श्रीमान्! भारत लौटते समय मैंने यह सूचना पाई कि भारत के लिये आप महात्मा गाँधी के अत्यन्त अनुरोध को स्वीकार करने के लिये उद्यत नहीं हैं। इस पर मैंने आपको तार दिया था कि काँग्रेस और सरकार के बीच में विवादग्रस्त बातों का निपटारा समझौते द्वारा हो सकता है,  और उनके निपटारे के लिये मैंने आपसे महात्मा गाँधी का सहयोग प्राप्त करने का अनुरोध किया था। मैंने भारत-सचिव और प्रधानमंत्री  के पास इसी आशय का एक तार भेजा था। उसमें मैंने यह आशंका प्रकट की थी कि कहीं ऐसा न हो कि महात्माजी के साथ विचार-विनिमय की आपकी अस्वीकृति से उनको सविनय अवज्ञा आन्दोलन पुन: चलाने के लिये बाध्य होना पड़े। कुछ दिन हुए जहाज से उतरने पर मुझे बतलाया गया कि प्रसिद्ध व्यक्तियों और संस्थाओं ने इसी आशय के बहुत से तार आपके पास भेजे हैं। लेकिन मुझे यह जानकर खेद हुआ कि आपने इन प्रार्थनाओं पर केवल ध्यान ही देना उचित नहीं समझा,  बल्कि उलटे सन् १८२७ के पचीसवें विधान के अनुसार महात्मा गाँधी को बन्दी कर लिये,  और एक दूसरा काला कानून निकाल दिया,  जिसको आपने अन्य प्रान्तों पर भी लागू कर दिया है। मैंने काले कानून को बड़ी सावधानी से पढ़ा है और उनके अनुसार देश में जो कार्रवाइयाँ हुई हैं, उनका मनन भी किया है। अब श्रीमान् के पास इस पत्र को भेजना मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूँ।


       गत २५ तारीख को आपने जो बड़ी व्यवस्थापिका सभा में भाषणा दिया था, उसमें आपने विकट परिस्थिति पैदा करने का दोष काँग्रेस के सिर मढ़ा है। मेरे एक तार के उत्तर में सर सैमुएल होर ने भी एक पत्र में कहा है कि क्या ही अच्छा होता यदि काँग्रेस इतनी उतावली से काम न लेती। “‘महात्मा गाँधी तथा लोक-हित के लिये न्याय का यही आग्रह है कि इस मामले में सत्य  का पालन निर्विवाद होना चाहिए।"


       ४ तारीख को सरकार ने जो वक्तव्य प्रकाशित किया है,  उसके सम्बन्ध में मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि काँग्रेस के विषय में कई भ्रमात्मक बातें लिखी गईं। उसमें कहा क्या था कि- “‘श्री गाँधी ने यह साफ-साफ नहीं कहा था कि महाराजाधिराज की सरकार की योजना की पूर्त्ति में वे या काँग्रेस, जिसका वे संचालन करते हैं,  सहायता देना चाहते हैं या नहीँ।"


        यह बात नितान्त असत्य है। मैंने और महात्मा गाँधी ने प्रधानमंत्री और भारत-सचिव से अलग- अलग भेंट की, जहाँ गोलमेज परिषद् के भावी कार्यक्रम में महात्मा गाँधी के सहयोग के प्रश्न पर भी विचार हुआ। बातचीत में, महात्मा गाँधी के एक प्रश्न के उत्तर में सर सैमुएल होर ने कहा था कि संरक्षण के विषय में  न तो प्रधान मंत्री की घोषणा और न साधारण सभा में  मेरा दिया गया व्याख्यान ही प्रमाण है। प्रस्तावित विषय-समिति के प्रत्येक सदस्य को यह अधिकार रहेगा कि वह सुधार की सलाह दे सकता है,  या प्रस्तावित सुधारो  में  किसी एक को रद्द करने की सलाह दे सकता है, और वह राष्ट्रीय सरकार को मिले हुए आर्थिक मामलो  की जाँच भी कर सकता है। मैंने महात्मा गाँधी से अनुरोध किया था कि इस अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषय का आश्वासन लिखित रुप में  ले लिया जाय।  उन्होंने लिखा-पढ़ी की,  ओर मुझे यह निश्चित रूप से मालूम हुआ कि उत्तर में  सर सैमुएल होर ने उस आश्वासन को पुन: दुहराया। यह स्पष्ट है कि लिखित आश्वासन माँगने में महात्मा गाँधी का अभिप्राय यही था कि कमेटी के कार्य में  सहयोग प्रदान करने का उन्हें अवसर मिले। मैं निश्चित रूप से जानता हूँ कि उन्होंने सहयोग करने का वचन प्रधानमंत्री और भारत-सचिव,  दोनों को दिया था। जिस दिन वे भारत में पहुँचे,  उस दिन उन्होंने  जनता के बीच में कहा था कि मैं सरकार के साथ सहयोग करने के लिये लालायित हूँ। उन्होंने कहा था-


       मैं इस आशा के साथ जहाज से उतरा था कि मुझे सहयोग करने के लिये साधन और मार्ग मिलेंगे। किन्तु पग-पग पर मुझें बड़ी रुकावटें दिखाई देती हैं। इस दशा में मैं क्या कर सकता हूँ?  फिर भी मैं उन मार्गों और साधनों को खोजने के लिये व्याकुल हूँ।"

        महात्मा गाँधी ने देखा कि बंगाल में काला कानून तो था ही,  यू. पी. और सीमान्त प्रदेश में भी काले कानून लागू हो गए हैं,  और फलस्वरूप इन प्रान्तों के कुछ प्रतिनिधि कार्यकर्त्ता बन्दी कर लिए गए हैं। यह सब होते हुए भी काँग्रेस की कार्यकारिणी समिति की पूर्ण सम्मति से उन्होंने आपके पास भेंट करने के लिये तार भेजा। काँग्रेस को किस पथ पर आगे बढ़ाया जाय,  यह आपसे जान लेना ही उनकी भेंट का मुख्य उद्देश्य था। ये बातें २९ दिसम्बर की हैं।  दूसरे दिन कलकत्ते में भाषण देते हुए और संयुक्तप्रान्त और सीमान्त प्रदेश में काँग्रेस की कार्रवाइयों का उल्लेख करते हुए आपने कहा था- “ ‘मैं आशा करता हूँ कि इस अन्तिम क्षण में विलायत से अभी लौटे हुए काँग्रेस के सर्वमान्य नेता श्री गाँधी जी उन कार्रवाइयों को बन्द का देंगे और हम लोगों के साथ सहयोग करेंगे। मुझे आशा है कि अपने देश के शासन का दायित्त्व भारतीयों को देने की विकट समस्या को सुलझाने में वे हम लोगों को अपने शक्तिशाली प्रभाव से साथ उठाने का अवसर देंगें। “


 


      जब आपने यह अपील की थी तब आपने महात्मा गाँधी की भेंट की प्रार्थना को क्यों अस्वीकार कर दिया, जो आपसे मिलकर सरकार की नीति को समझ लेना चाहतें थे? जब आप भी काँग्रेस से सहयोग ही चाहते थे, तब आपने ऐसी शर्त्तें क्यों लगा दीं, जिन्हें कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति उस परिस्थिति में स्वीकार नहीं कर सकता? आपने इस बात पर क्यों जोर दिया कि आप यदि उनसे मिलेंगे तो बंगाल, संयुक्तप्रान्त तथा सीमान्त प्रदेश की वर्त्तमान सरकारी नीति पर उनके साथ बातचीत नहीं करेंगे? उसमें भी खूबी यह कि आपने उन प्रान्तों में अपनी कार्रवाई बन्द करने का उनसे अनुरोध किया है। आपके तार का उत्तर देते हुए और आपकी सम्पूर्ण शंकाओं का समाधान करते हुए महात्मा गाँधी ने लिखा था-


      यदि अब भी समय हो, तो मैं आपसे अनुरोध करूँगा कि आप अपने निर्णय पर फिर से विचार करें और बातचीत के विषय और विस्तार पर कोई शर्त्त न लगाएँ। आप मुझे मित्र समझिए। मैं अपनी ओर से आपको यह वचन देता हूँ कि जो बातें आप मेरे सामने कहेंगे उनका उदारता के साथ अध्ययन करूँगा और उन प्रान्तों में जाकर अधिकारियों की सहायता से प्रश्न के दोनों पहलुओं पर विचार करुँगा, और यदि मुझे इस जाँच–पड़ताल के बाद यह विश्वास हो गया कि लोगों की भूल है,  और मेरे-सहित कार्यकारिणी समिति ने भी वास्तविक स्थिति को समझने में भूल की है तथा सरकार निर्दोष है, तो मुझे अपनी भूल स्वीकार करने में संकोच न होगा,  तथा उसके अनुसार काँग्रेस को आदेश देने में मैं किसी प्रकार की आनाकानी न करूँगा। साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया था कि “‘सरकार के साथ सहयोग करने की मुझे इच्छा है, किन्तु साथ-ही-साथ मैं अपने सहयोग की सीमा श्रीमान् से स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। अहिंसा मेरा धर्म है। जब अपने देश के शासन में जनता का कोई हाथ न हो, तब मैं सविनय अवज्ञा को एक स्वाभविक शस्त्र समझता हूँ।  इतना ही नहीं, बल्कि इसे मैं सशस्त्र क्रान्ति एवं हिंसा का स्थानापन्न भी मानता हूँ। अत: अपना धर्म नहीं छोड़ सकता। मुझे उसके पालन में और उन यथार्थ बातों के आधार पर, जिनकी पुष्टि सरकार की हाल की कार्रवाइयों से होती है, और जिनके कारण जनता को आगे बढ़ाने का अवसर नहीं मिल सकता, काँग्रेस की कार्यकारिणी समिति ने मेरी राय को मानकर सविनय अवज्ञा का एक ढाँचा खड़ा किया है, और जो प्रस्ताव पास किया है, उसकी प्रतिलिपि मैं इसके साथ भेजता हूँ। यदि श्रीमान् मुझसे मिलना उचित समझते हों तो इस प्रस्ताव की कार्रवाई इस आशा में तब तक के लिये स्थगित कर दी जाय, जबतक कि बातचीत चलती रहे, कि शायद फलस्वरूप यह प्रस्ताव सदैव के लिये त्यक्त हो जाय”’’। “


       आपने अवश्य देशा होगा कि प्रस्ताव प्रयोगात्मक था, और उसमें सरकार के साथ सहयोग करने की अभी अभिलाषा थी। उसमें कहा गया था कि: “ “‘यदि वाइसराय महोदय अपने तार पर पुन: विचार करें और काला कानून तथा उसकी कार्रवाइयों के सम्बन्ध में उचित वचन दें,  और पूर्ण स्वराज्य के लिये काँग्रेस को अपना दावा पेश करने, उचित सम्मति देने तथा बातचीत करने का पर्याप्त अवसर दें, और पूर्ण स्वराज्य के स्थापित होने तक देश के शासन का संचालन प्रजा के प्रतिनिधियों की राय से हो, तो कार्यकारिणी समिति सरकार के साथ सहयोग करने के लिये तैयार है”’’। “

        और उससे यह भी स्पष्ट हो गया था कि सरकार की ओर से सन्तोषजनक उत्तर न मिलने के कारण ही कार्यकारिणी समिति ने सविनय अवज्ञा तथा लगानबन्दी का आन्दोलन आरम्भ करने का देश से अनुरोध किया था। उसमे  कहा गया था- ‘कोई सन्तोषजनक उत्तर न मिलने पर कार्यकारिणी समिति सरकार का यही अर्थ समझेगी कि दिल्ली-सन्धि का अन्त हो गया’’। आपने दुर्भाग्यवश महात्मा गाँधी के अनुरोध का विरोध इसीलिये किया कि आपको उस विचार-विनिमय से कोई लाभ होता नहीं दिखाई देता था,  जो सविनय अवज्ञा की धमकी देकर होने वाला हो। आपने कहा था कि काँग्रेस ने जो कार्रवाई करने की इच्छा प्रकट की है,  उसके फलस्वरूप सभी कामों के लियें सरकार, गाँधी जी तथा काँग्रेस को उत्तरदायी  समझेगी, और उनका सामना करने के लिये सरकार सम्पूर्ण आवश्यक साधनों की शरण लेगी। फिर भी आपके तथा आपकी सरकार के निर्णय पर खेद प्रकट करते हुए महात्मा जी ने तार भेजा। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि मेरी सच्ची भावना को धमकी समझ लेना भूल है। उन्होंने आपकी याद दिलाई थी कि सविनय अवज्ञा के चलते रहने पर ही दिल्ली के समझौते की बातचीत हुई और समझौता हुआ;  और यह भी याद दिलाई कि जब सन्धि हो गई तब सविनय अवज्ञा आन्दोलन सदैव के लिये बन्द नहीं कर दिया गया था, बल्कि वह कुछ बात के लिये स्थगित कर दिया गया था,  और इस बात को आप तथा आपकी सरकार ने शिमले में सितम्बर में श्री गाँधी जी के लन्दन जाने के पहले स्वीकार भी कर लिया था। उन्होंने यह भी याद दिलाई कि,  यद्यपि उन्होंने यह स्पष्ट कह दिया था कि काँग्रेस को कुछ विशेष परिस्थितियों में सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करना पड़ेगा,  तथापि सरकार ने समझौते को नहीं तोडा। यदि काँग्रेस का यह निर्णय सरकार को पसंद न होता तो महात्मा जी को लन्दन भेजना या न भेजना सरकार के हाथ में था। फिर भी आपने कोई उदारता नहीं दिखलाई। महात्मा गाँधी को कोई जवाब न मिला। उलटे एकदम आचानक वे बन्दी बना लिये गए। अस्तु, मैं बड़ी नम्रता के साथ कह देना चाहता हूँ कि इन बातों से यह स्पष्ट है कि काँग्रेस ने पहले छेड़छाड़ आरम्भ नहीं की, बल्कि आपकी सरकार ने ही उसे उभाड़ दिया।


      आप यह जानते हैं कि महत्मा गाँधी भारत सर्वश्रेष्ठ जीवित महापुरुष हैं, और जीवन की पवित्रता, त्याग एवं देश और संसार की सेवा के उच्च भावों के लिये भारत के अगणित मनुष्य उनकी पूजा करते हैं, और संसार के सभी लोग उनका आदर करते हैं। आप यह भी जानते हैं कि दस वर्षों से वे भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक संस्था के सर्वमान्य नेता हैं। कुछ ही दिनों की बात है, जब सविनय अवज्ञा आन्दोलन जोरों पर था, सरकार ने उनके साथ समझौता किया था और इंग्लैण्ड के मन्त्रिमण्डल के आदेशानुसार आपने उनको गोलमेज परिषद् में भाग लेने के लिये निमंत्रित किया था। आप समझ सकते हैं कि चाहे इस वर्ष या आगामी वर्ष, जब कभी भारत में नया शासन-विधान प्रचलित होगा, तब आपको महात्मा गाँधी के हाथों देश का भार सौंपना होगा। आप यह भी जानते हैं कि उनसे मिलने से आपने जो इनकार कर दिया, उससे देश में विषम स्थिति उत्पन्न होने की सम्भावना है। आपने इस बात की कुछ भी चिन्ता न की कि महात्मा गाँधी जैसे महापुरुष, जो इस राष्ट्र के सर्वप्रधान नेता हैं, आपसे मिलने के शिष्टाचार की आशा कर सकते हैं। इस शिष्टाचार की अवहेलना कर आप दिल्ली-सन्धि के द्वारा खुले हुए मार्ग से विमुख हो गए हैं। इतना ही नहीं,  इससे समस्त भारत का अपमान भी हुआ है।


 

काला कानून

 

 

       आप और आपकी सरकार दो पग और भी आगे बढ़ गए। न्याययुक्त राज्य के बदले आपने काले कानून का राज्य स्थापित कर दिया है,  और महात्मा गाँधी के बीच जो पत्र-व्यवहार हुआ,  उसमें एवं सरकार द्वारा प्रकाशित वक्तव्य में,  आपने इन काले कानूनों का औचित्य सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। इसमें सन्देह नहीं कि सन्तोषजनक शान्तिपूर्ण शासन की प्रतिष्ठा के लिये भारत-सरकार के विधान से गवर्नर जनरल को काला कानून निकालने का अधिकार मिला है। किन्तु उक्त विधान के अक्षरों का नहीं बल्कि उसकी भावना का यह अर्थ है कि जिन बातों के लिये व्यवस्थापिका सभाएँ बनी हुई हैं, उनके लिये गवर्नर जनरल इस शक्ति का उसी समय उपयोग कर सकता है,  जब उसके पास अपनी प्रबन्धकारिणी  समिति को अधिक शक्ति दिलाने के लिये व्यवस्यापिका सभा से अनुमति लेने का समय न हो। कदाचित् यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि जब कोई प्रस्ताव व्यवस्थापिका सभा के सामने रक्खा जाता है,  तब उससे यह लाभ होता है कि उस पर लोकपक्ष की राय आती एवं जनता के प्रतिनिधियों को आलोचना करने का अवसर मिलता है। अवश्य ही यह लाभ उस समय नहीं मिल सकता,  जब प्रबन्धकारिणी अथवा स्वयं बड़े लाट महोदय ही उसको काले कानून के रूप में पास कर दें। इस दशा में जहाँ पर आवश्यकता भी न हो,  वहाँ पर भी काला कानून पास हो जाने की आशंका होती है, और लोकहित के लिये जितना अधिकार प्रबन्धकारिणी को मिलना चाहिए,  उससे कहीं अधिक अधिकार मिल जाने का भय रहता है। अत: जहाँ पर व्यवस्यापिका सभाएँ स्थापित हैं,  वहाँ बड़े लाट को विशेष अधिकार का प्रयोग विशेष अवसरों पर ही करना चाहिए। मुझे यह देखकर दु:ख होता है कि जिन काले कानूनों को आपने जारी किया है, उनके जारी करने में आपका ध्यान उपर्युक्त बातों पर नहीं गया। मैं उनमें से एक बंगाल-काले-कानून पर विचार करूँगा।


 

बंगाल का काला कानून

 

 

     पहले ही मैं यह कह देना चाहता हूँ कि बंगाल में जो अपराध हुए हैं,  उनका मैं जोरदार शब्दों में विरोध करता हूँ और उनके लिये मैं खेद प्रकट करता हूँ। आत्मरक्षा या देश पर आक्रमण को रोकने के अतिरिक्त,  यदि एक मनुष्य दूसरे की हत्या करता है तो मैं इसे बड़ा पाप समझता हूँ। परन्तु आपने बंगाल के लिये जो कठोर कानून जारी किया है,  उसको मैं घोर निन्दा करता हूँ। भारत में इससे बढ़कर कठोर दूसरा कोई कानून जारी ही नहीं किया गया है। इसकी धाराएँ अत्यन्त मनमानी और अन्याय से पूर्ण हैं। इससे निर्दोष नागरिकों को व्यर्थ में कष्ट और अपमान सहना पड़ता है। मैं साहस के साथ कहता हूँ कि यदि सरकार का विचार देश का शासन,  जनता की राय से और न्याय के साथ करना होता तो बहुत पहले ही क्रान्तिकारी दल नष्ट हो गया होता। किन्तु यदि ऐसी बात न हुई और वर्त्तमान कानून के द्वारा प्रबन्धकारिणी को जो शक्ति मिली हैं,  उससे अधिक शक्ति देने का संकल्प गवर्नर ने कर लिया था, तो उनका कर्त्तव्य था कि जिस प्रकार उन्होंने १९२५ ई. में एक काले कानून की अवधि बीत जाने पर किया था,  वैसे ही वे अपने प्रस्तावों को व्यवस्थापिका सभा के सामने रखते। किन्तु ऐसा न कर जनता पर इतना कठोर और व्यापक कानून लादकर सरकार ने जनता के  हृदय पर गहरी चाट पहुँचाई है। उस समय मैं और महात्मा गाँधी इंग्लैण्ड में थे। उस समय इसके विषय में पढ़कर हम लोगों को बड़ा दु:ख हुआ। लन्दन छोड़ने के पहले मैं प्रधान मंत्री, भारत-सचिव और मन्त्रिमण्डल के कई सदस्यों और विरोधी दल के नेताओं तथा कुछ प्रसिद्ध वकीलों और दो भूतपूर्व वाइसरायों से मिला,  और विशेष रूप से मैंने उनका ध्यान काले कानूनों के भयंकर स्वरूप की ओर आकर्षित किया। मैंने बतलाया कि यह दुर्भाग्य की बात है कि गोलमेज परिषद् के चालू रहने पर ऐसा काला कानून जारी हो, और अनुरोध किया कि काला कानून रद्द कर दिया जाय। उसमें ऐसे सुधार किए जायँ कि उसके बुरे पहलू दूर हो जायँ। इसके विषय में महात्मा गाँधी ने भी प्रधान मंत्री, भारत-सचिव एवं कई अन्य पुरुषों से बातचीत की थी। अन्य भारतीय भी इसके लिये प्रधानमंत्री तथा भारत-सचिव से मिले थे,  और इसमें परिवर्त्तन करने के लिये उन्होंने अनुरोध किया था। कई प्रतिष्ठित अंग्रेजों ने कहा था कि हम काले कानूनों के लिये लज्जित हैं। निदान इस मामले में आप से फिर विचार करने के लिये प्रार्थना की जाती है। हम लोगों की सलाह पर भारत-सचिव भी विचार करने वाले थे। महात्मा गाँधी बंगाल जाने वाले थे और आतंकवादियों को अपने मार्ग से विमुख करने के लिये अपने प्रभाव का प्रयोग भी करने वाले थे। इसका उद्देश्य यह था कि उचित उपायों द्वारा अपराध को कानून द्वारा रोका जाय,  अपराधियों पर उचित मुकदमे चलें,  जनता में आतंक न फैले, वे साधारण अधिकार से वंचित न रहें,  और एक ऐसा वातावरण उत्पन्न हो,  जिससे शासन-विधान का कार्य सन्तोषजनक रूप से प्रतिपादित हो सके। लेकिन जिन उपायों का आपने अवलम्बन किया है,  उनसे उन उद्देश्यों की पूर्त्ति असम्भव हो गई हैं|  काला कानून देखने में तो आतंकवादियों के विरुद्ध है,  परन्तु समूचे व्यवहार में काँग्रेस-आन्दोलन को नष्ट करने एवं जनता को कायर बनाने के लिये ही इसका प्रयोग हुआ है।


 

संयुक्त प्रदेश का काला कानून

 

 

     और भी देखिए। जब यह सब लन्दन में हो रहा था, तब संयुक्त प्रान्त के लिये उसी तरह का काला कानून आपने जारी किया। बंगाल के बारे में यह तो कहा जा सकता है कि उस प्रान्त में जो राजनीतिक अपराध हुए हैं,  उनके कारण काले कानून जारी हुए हैं, किन्तु जो काला कानून संयुक्त प्रान्त के लिये जारी हुआ हुआ है, उसके विषय में तो यह नहीं कहा जा सकता? गत २५ तारीख को बड़ी सभा में भाषण देते हुए आपने कहा था कि, ‘“युक्त्तप्रान्त में काँग्रेस के प्रतिनिधियों से प्रान्तीय सरकार बातचीत कर रही थी, इसी बीच में काँग्रेस ने लगानबन्दी-आन्दोलन आरम्भ करने की घोषणा कर दी, और यदि उनकी कार्रवाइयों का सामना किया जाता तो अवश्य ही उसके फलस्वरूप परस्पर युद्ध होने लग जाता।


      अब हम वास्तविक स्थिति पर विचार करेंगे। जो संयुक्त प्रान्त की कठिनाइयाँ कृषि-सम्बन्धी थीं, फसल के नष्ट हो जाने, तथा खासकर बाजार के मन्दे हो जाने से किसानों की जो दशा हुई, उसकी जाँच और उनकी सहायता करने की आवश्यकता पड़ी। सरकार ने बहुत अंशों में लगान माफ कर दिया, मगर किसानों का कहना था कि उनको काफी मदद नहीं मिली। सरकार और काँग्रेस-समिति में इस विषय पर बहुत दिनों तक पत्र-व्यवहार और बातचीत चलती रही। अन्त में सरकार ने इस बात की जरूरत समझी कि इन मामलों पर विचार तथा इनका निपटारा करने के लिये काँग्रेस और सरकार के प्रतिनिधियों की एक सम्मिलित सभा हो। लेकिन दुर्भाग्यवश जब लगान-वसूली का समय आया तब कोई सभा न की गई। समझौते की बातचीत होने पर भी पहली किस्त वसूल की जाने वाली थी। किसान लोग नीलामी और बेदखली के भय से त्रस्त हो रहे थे। ऐसी परिस्थिति में उचित मार्ग का  अवलम्बन करने के लिये काँग्रेस से सलाह माँगी गई। किसानों को यह सलाह दी गई कि जबतक समझौते का अन्त नहीं होता,  तबतक थोड़े दिन के लिये लगान रोके रहें। ऐसा होने पर भारत सरकार के आदेशानुसार संयुक्त प्रान्त की सरकार ने प्रान्तीय काँग्रेस समिति को सूचित किया कि जबतक काँग्रेस इस बात का निश्चित आश्वासन नहीं देती कि लगानबन्दी की योजना का प्रस्ताव स्थगित किया गया और इलाहाबाद काँग्रेस समिति का लगान न चुकाने का आदेश रद्द किया गया है,  तबतक सरकार ऊपर कही हुई बातचीत में आगे भाग लेने के लिये तैयार नहीं है। इसके उत्तर में प्रान्तीय-कांग्रेस-समित के सभापति ने २५ नवम्बर,  सन् १९३१ ई. को लिखा कि जब समिति को सूचना मिली कि लगान वसूल करने में कड़ाई की जायगी,  तो समिति ने बाध्य-होकर किसानों को लगान न देने की सलाह दी। साथ उन्होंने यह भी कहा है कि- "यदि वसूली बन्द कर दी जाय या स्थगित कर दी जाय तो समिति की सलाह,  उसके प्रस्ताव और उसकी सूचनाएँ तत्काल वापिस ले ली जायँगी। वसूली जारी रहने पर और किसानों को पूरी सहायता न मिलने पर इस सलाह के सिवा काँग्रेस-समिति के पास कोई चारा नहीं है।"


      श्री एच्. डब्ल्यू इमर्सन के पास २८ नवम्बर,  सन् १९३१ ई. को भेजे गए एक पत्र में श्री वल्लभ भाई पटेल ने एक योजना रक्खी थी कि,  ‘परस्पर के समझौते तक वसूली और काँग्रेस के प्रस्ताव,  दोनों साथ-साथ स्थगित किए जा सकते हैं’’।“ उन्होंने यह भी कहा था कि- ‘इससे जमीन्दारों और सरकार की कोई हानि न होगी। काँग्रेस इस बात को चाहती है कि संयुक्त-प्रान्त में शान्ति बनी रहे। और मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप मेरी योजना पर विचार करें और देखें कि इस आधार पर,  किसी मध्यवर्त्ती मार्ग पर विचार हो सकता है या नहीं। लेकिन अभाग्यवश प्रान्तीय काँग्रेस-समिति के प्रस्ताव एवं श्री पटेल की योजना को संयुक्तप्रान्त की सरकार ने स्वीकार नहीं किया। प्रान्तीय काँग्रेस-समिति को संयुक्तप्रान्त की सरकार के मंत्री ने २ दिसम्बर,  सन् १९३१ ई. को अपने पत्र में लिखा था- "मुझे यह कहना है कि प्रान्तीय परिषद् ने अपने निर्णयों  को न तो स्थागित किया है और न प्रयाग जिला काँग्रेस-समिति को अपने प्रचारित सूचनाओं को रद्द करने का आदेश दिया है,  अत: १७ नवम्बर सन् १९३१ ई. को सरकार ने अपने पत्र में जो बातचीत के लिये अवसर दिया था,  उसे वह वापस ले लेती है। इलाहबाद जिले में जो लगान घटाया गया है उसकी वसूली रोकने या स्थगित करने का सरकार का बिल्कुल विचार नहीं हैं’’।


       इस पत्र का उत्तर देते हुए श्री शेरवानी जी ने कहा था- “‘हम लोग किसानों को पर्याप्त सहायता दिलाने का प्रयत्न कर रहे थे और इसकी हम लोग कुछ चिन्ता नहीं करते थे कि वह सहायता किस प्रकार प्राप्त होती थी। हम लोगों के इस दुहराए हुए निवेदन का कुछ भी उत्तर न मिला। हम लोगो  ने इस बात को और स्पष्ट कर दिया था कि बातचीत होने तक अगर लगान की वसूली रोक दी जाती है तो हम लोग प्रसन्नतापूर्वक लगानबन्दी की सलाह को वापिस ले लेंगे। अगर वसूली पुराने ढर्रे पर ही होती,  जो हम लोगों की दृष्टि में ठीक नहीं था तो इस प्रश्न पर विचार करने में वस्तुत: कोई तथ्य नहीं था। आपके जिस पत्र का उत्तर भेजा जा रहा है,  उसके दूसरे वाक्य से यह प्रकट होता है कि सरकार भी मानती है कि पुरानी प्रणाली उचित नहीं थी। मैं यह कहूँगा कि इस समस्या को सन्तोषजनक रूप से सुलझाने के लिये जो भी बातचीत हो, उसमें भाग लेने के लिये हम अब भी पहले की ही तरह तैयार हैं।"


     जैसा कि पहले कहा जा चुका है, संयुक्तप्रान्त की सरकार ने लगान में बहुत छूट कर दी थी। किसानों के साथ न्याय करने के लिये भावी कार्यक्रम को निश्चित करने में काँग्रेस से सलाह करने की आवश्यकता सरकार को मालूम हो गई थी। अतएव यह दुःख की बात है कि बातचीत की अवधि तक वसूली स्थगित करने के काँग्रेस के प्रस्ताव को सरकार ने स्वीकार नहीं किया। यदि सरकार उस समय की वसूली को रोकने के लिये तैयार नहीं हुई तो सरकार को बातचीत समाप्त होने की अवधि तक किसानों  को लगान-बन्दी की सलाह लेने का हठ छोड़कर काँग्रेस से बातचीत करनी चाहिए थी। संघर्ष बचाने एवं समझौता करने की जितनी जिम्मेदारी काँग्रेस पर है, उतनी ही सरकार पर भी थी। सरकार ने कॉंग्रेस  को जो अन्तिम पत्र भेजा था, उसके तेरह दिन बाद काला कानून निकाला गया। उतने समय में इस विषय पर पूरा विचार और समझौता हो गया होता।


    श्रीमान्, मेरी समझ में अगर मामला इस प्रकार तै नहीं हुआ तो भी काले कानून की आवश्यकता न थी संयुक्त प्रान्तीय सरकार का दावा है, और यह दावा उचित भी है कि किसानों के लिये उसने बहुत किया है जो कार्य उसने किए हैं, उसके यश एवं देश के प्रचलित विधानों की सहायता से वह सभी कठिनाइयों को उचित और व्यवस्थित ढंग से संभालने में समर्थ होती। काले कानून का औचित्य सिद्ध करने के लिये,  संयुक्त प्रान्तीय सरकार ने जो वक्तव्य प्रकाशित किया है,  उसे मैंने सावधानी के साथ पढ़ा है। मेरी राय में वह सिद्ध करने में असफल हुई है। वक्तव्य से मालूम होता है कि १० मार्च को पण्डित जवाहरलाल ने अखिल भारतीय काँग्रेस-समिति से प्रान्तीय काँग्रेस-समिति को एक गश्ती चिट्ठी भेजी थी, जिसमें देहातों में काँग्रेस की संस्था को दृढ़ करने एवं अवसर पर लोगों को तैयार करने के लिये कार्यकर्त्ता भेजने का अनुरोध किया गया था। उसमें लिखा था-


    "दिल्ली का समझौता थोड़े ही दिनों के लिये है। वह अन्तिम समझौता नहीं है। जब हम लोग पूर्ण रूप से अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे,  तभी हमें शान्ति मिलेगी।" सरकार के वक्तव्य से यह प्रकट होता है कि जब गाँधी जी इंग्लैण्ड के लिये रवाना हो गए, तब उसके दो दिन बाद महात्मा जी की अनुपस्थिति में क्या कार्रवाई होनी चाहिए। इसके सम्बन्ध में एक दूसरी गश्ती चिट्ठी पण्डित जवाहरलाल जी ने भेजी थी,  जिसमें यह अनुरोध किया गया था कि लोग महात्मा गाँधी के लौटने पर उनका स्वागत तथा सब परिस्थितियों का सामना करने के लिये तैयार रहें। और ग्राम- संस्थाओं पर विशेष ध्यान देने एवं सर्वत्र स्वयंसेवक चुनने के लिये काँग्रेस-संस्थाओं से विशेष अनुरोध किया गया था। मैं पूछता हूँ कि जो दल अपना अस्तित्त्व कायम रखने पर तुला हो,  उसका नेता क्या ऐसी परिस्थिति में इसी प्रकार की गश्ती चिट्ठी न भेजता?  इन बातों में कौन सी ऐसी बात है जिसका विरोध किया जा सकता है?  इसे कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता कि दिल्ली की सन्धि कोई स्थायी सन्धि नहीं थी। जिस प्रकार सरकार ने इसको समझा,  उसी प्रकार काँग्रेस ने भी इसे समझा। सरकार ने जिस नीति का अवलम्बन किया उससे यह प्रकट होता है कि पण्डित जवाहरलाल जी ने जो मार्ग चुना,  वह बड़ी बुद्धिमानी का था। तीसरी शिकायत यह है कि त्तारीख १० मार्च के निश्चित कार्यक्रम के अनुसार जो स्वयंसेवक कई जिलों में प्रचार कर रहे थे,  उनमें विद्रोह की बढती हुई भावना प्रकट हो रही थी। यह बात इतनी साधारण और अस्पष्ट थी कि इस पर कुछ ध्यान नहीं दिया जा सका था। एक दूसरी शिकायत यह थी कि सितम्बर मास में काँग्रेस ने,  किसानों की दशा का एक विवरण प्रकाशित किया था,  जिसकी प्रकृति किसानों और जमीन्दारों में मनोमालिन्य पैदा करने की थी। जमीन्दारों और किसानों के बीच परस्पर सम्बन्ध स्थापित करने की किसी भी योजना पर आक्षेप किया जा सकता है। इससे जो बुराई पैदा होने को सम्भावना थी,  वह मैत्रीपूर्ण विचार-विनिमय से दूर हो सकती थी।


      अन्तिम शिकायत यह थी कि संयुक्तप्रान्त के एक जिले में एक काँग्रेसी ने समानान्तर सरकार की योजना तैयार की है,  जिसके अनुसार पंचायत के प्रस्तावित कर्त्तव्यों में एक कर्त्तव्य यह भी था कि सब लोग स्त्रियों को नेता बनाने के लिये कोशिश करें, जिससे आगामी संघर्ष में पुरुषों के गिरफ्तार हो जाने पर स्त्रियाँ नेतृत्त्व कर सकें। सरकार के विरुद्ध दिल्ली-सन्धि तोड़ने की शिकायत भी समय-समय पर काँग्रेस ने की है। लेकिन इसे जाने दीजिए। ऊपर उद्धृत सरकार के वक्तव्य में लिखित बातों को लीजिए। मैं कहता हूँ कि ये बातें बंगाल,  चटगाँव के काले कानून की धाराओँ को संयुक्तप्रान्त में लगाने के लिये उपयुक्त सिद्ध नहीं हो सकी हैं। जिस पत्र-व्यवहार की ओर मैंने ध्यान आकर्षित किया है,  उससे यह स्पष्ट है कि प्रान्तीय काँग्रेस-समिति के अध्यक्ष अन्त तक सरकार के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करके मुख्य प्रश्नों पर समझौता करने के लिये उत्सुक रहे हैं। यह दु:ख की बात है कि उन्हें इन कठिनाइयों से निकलने के लिये मार्ग ढूँढने में असफलता मिली। ऊपर जिन बातों का उल्लेख हो चुका है उन्हें देखते हुए, लोकपक्ष आपके पक्ष से कभी सहमत नहीं हुआ कि काँग्रेस ने दिल्ली सन्धि को तोड़ा है, और न वह संयुक्त प्रान्तीय सरकार से ही सहमत हो सका कि सब बातों की जिम्मेदारी  काँग्रेस और उसके अनुयायियों पर ही है। मैं कहता हूँ कि काँग्रेस से कहीं अधिक उनकी जिम्मेदारी सरकार के सिर पर है, क्योंकि कितना लगान वसूल किया जाय,  इसका फैसला होने तक सस्कार ने लगान वसूल करना स्थगित नहीं रक्खा और ऐसी परिस्थिति में काला कानून जारी करके सरकार ने दिल्ली-सन्धि को तोड़ दिया।


       श्रीमान् ने सीमान्त-पश्चिमोत्तर प्रदेश का भी उल्लेख किया था। आपकी शिकायत थी कि लोगों की अन्य प्रान्तों की भाँति अधिकार पाने की इच्छा को कार्यान्वित करने के लिये सरकार ने खाँ अब्दुल गफ्फार खाँ और उनके अनुयायियों द्वारा संचालित काँग्रेस दल का "सहयोग प्राप्त करने के लिये बार-बार प्रयत्न किया, लेकिन उन प्रयत्नों पर या तो कोई ध्यान ही नहीं दिया गया था,  या उनको ठुकरा दिया गया। श्रीमान् ने चटगाँव और संयुक्तप्रान्तीय काले कानून से भी भयंकर काला कानून  जिस दिन सीमान्त प्रदेश के लिये जारी किया,  उसी दिन अर्थात् तारीख २५ दिसम्बर को प्रकाशित अपने वक्तव्य में, सामान्यत: उस स्थिति की विवेचना की है,  जिससे आपकी दृष्टि में की हुई कार्रवाई की आवश्यकता प्रकट होती है,  और जिसमें आपने मुख्यत: खाँ अब्दुल गफ्फार खाँ के कामों की "शिकायत की है। इनमें बहुत सी कार्रवाइयां उसी साधारण ढंग की हैं,  जिनका आचरण काँग्रेस वर्षों से कर रही है। प्रत्येक राजनीतिक संस्था को अपने सदस्यों की संख्या बढ़ाने,  अपना प्रभाव डालने, सभा करने तथा जलूस निकालने का अधिकार है। जबतक उसका अभिप्राय अपराध करना नहीं है,  जबतक उसके कार्यों से दूसरो के कार्यों में बाधा नहीं पहुँचती,  जबतक वह अपने उद्देश्य क्रो शान्तिमय ढंग से प्राप्त करने का प्रयत्न कर रही है,  तबतक उसको ऐसा करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। जब कोई भी व्यक्ति भाषण या अपने कार्यों के द्वारा किसी प्रचलित विधान को तोड़ता है,  तब वह स्वत: दण्ड का भागी बनता है। अगर खाँ अब्दुल गफ्फार खाँ ने ऐसा किया था तो उन पर मुकदमा चलाना चाहिए था। ऐसा ही बर्त्ताव उनके अनुयायियों के साथ भी होना चाहिए था।  इसमें तो कोई शिकायत करने की बात ही नहीं थी।


       जान पड़ता है कि खाँ साहब के विरुद्ध चीफ कमिश्नर की यह शिकायत थी कि प्रधानमंत्री द्वारा माण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड-सुधार के सीमा प्रान्त प्रदेश में प्रचलित होने की घोषणा पर उन्होंने तथा अनके अनुयायियों ने उत्साह नहीं प्रकट किया और घोषणा को कार्यान्वित करने के लिये चीफ कमिश्नर ने २२ दिसम्बर को जो दरबार किया था, उसमें निमंत्रित किए जाने पर भी खाँ अब्दुल गफ्फार खाँ और उनके भाई सम्मिलित नहीं हुए, और उटमँजाई में होने वाली प्रान्तीय काँग्रेस–समिति ने प्रधानमंत्री की घोषणा का एक निश्चित घोषणा द्वारा विरोध किया कि हम पूर्ण स्वराज्य से कुछ भी कम स्वीकार नहीं करेंगे। सीमान्त प्रदेश में जो दोहरे प्रबन्ध के साथ माण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड–सुधार प्रचलित होने वाला है, उसकी निन्दा सरकारी एवं गैरसरकारी सभी लोगों ने की है। इसलिये चीफ कमिश्नर या आपकी सरकार को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए था कि उस प्रान्त को अन्य प्रान्तों के समान अधिकार देने का वचन होने पर भी कुछ पठान ऐसे हैं जो इसे पसंद नहीं करते। यदि उनमें से कुछ की दृष्टि में उनके अभीष्ट पूर्ण स्वत्त्व की प्राप्ति में इस सुधार का प्रयोग बाधक होगा, तो यह क्षम्य है। कुछ ने यह सोचा होगा कि जो विधान थोड़े दिन तक रहेगा, उसके प्रयोग से कोई लाभ नहीं है। अत: किसी भी दृष्टि से श्री अब्दुल गफ्फार खाँ और उनके भाई के विरुद्ध यह दोषोरोपण नहीं करना चाहिए था कि उन लोगों ने उस दरबार में नहीं भाग लिया, जिसका उद्देश्य उन लोगों को अच्छा नहीं जँचा। इतना ही नहीं, बल्कि यदि वे उचित समझते तो इस प्रस्ताव के विरुद्ध लोकपक्ष को अपने अनूकूल करने का भी उन लोगों को अधिकार था।


      एक और भयंकर दोषारोपण, जो सरकार ने श्री अब्दुल गफ्फार खाँ पर किया था, वह यह था कि उन लोगों ने यह मत प्रकट किया था कि उनको पूर्ण स्वतंत्रता से कुछ भी कम स्वीकार नहीं है। हममें से बहुतों को यह गुमान था कि प्रत्येक समझदार अंग्रेज में उतनी समझ होगी कि जैसे अन्य लोगों को  पूर्ण स्वतंत्रता चाहने का अधिकार है,  वैसे ही भारतीयों को भी पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने की इच्छा करने का जन्म –सिद्ध अधिकार है। दोनों दलों की तुल्य स्वतंत्रता के आधार पर ही,  वह मित्रता स्थापित की जा सकती है,  जिसके लिये हममें से बहुत से लोग भारत तथा ब्रिटेन के हित के लिये उत्सुक हैं। कोई भी व्यक्ति एक ही साथ मित्र और गुलाम नहीं हो सकता। काँग्रेस ने जनवरी सन् १९३० ई. में पूर्ण स्वतंत्रता को अपना ध्येय घोषित किया था। तभी से उस उद्देश्य को दुहराने के लिये २६ जनवरी का दिन-नियत कर दिया गया है। देशभर में सार्वजनिक सभाओं में यह खुले रूप से घोषित किया गया है। मजे की बात यह है कि सन्धि के समय महात्मा गाँधी ने कहा था कि गोलमेज सम्मेलन में पूर्ण स्वतंत्रता की माँग पेश करने के लिये हम अपने को स्वतंत्र समझेंगे और उन्होंने ऐसा किया भी था। सम्राट् की  सरकार ने इसका विरोध भी नहीं किया। अस्तु यदि श्री अब्दुल गफ्फार खाँ और उनके दल ने यह विचार प्रकट किया कि हम लोगों को पूर्ण स्वतंत्रता से कुछ भी कम स्वीकार नहीं होगा,  तो उनको अपराधी नहीं समझना चाहिए था। जो कारण चीफ कमिश्नर ने सीमान्त प्रदेश में काला कानून चलाने के लिये दिए हैं, उनका औचित्य सिद्ध करने में वे सर्वथा असफल हुए हैं। और श्री अब्दुल गफ्फार खाँ तथा अन्य नेताओं की गिरफ्तारी का भी वे सन्तोषजनक कारण नहीं दे सके हैं। सरकार को मालूम होना चाहिए था कि इस प्रकार सीमान्त प्रदेश में सन्तोषजनक और शान्तिजनक सरकार के स्थापित होने के बदले उलटा ही प्रभाव पड़ने की सम्भावना थी। इससे जो फल हुआ है, वह वस्तुत: बहुत भयंकर है।


      यदि कुछ मनुष्य अपने विश्वासपात्र नेता की गिरफ्तारी पर दु:ख प्रकट करने के लिये इकट्ठे हो गए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। कहा जाता है कि भीड़ को खदेड़ने के लिये लाठी चलाई गई थी। इसके बाद पुलिस पर कुछ ढेले और पत्थर फेंके गए और तब पुलिस ने गोली चलाई। क्या सचमुच ऐसी स्थिति हो गई थी कि पुलिस को गोली चलाने के लिये बाध्य होना पड़ा?  और क्या उनको इतनी देर तक गोली चलाने की आवश्यकता थी? सरकारी विवरण में लिखा है कि चौदह व्यक्ति मारे गए और चौबीस घायल हुए। आँक्सफोर्ड के डॉन (Don),  फादर एलविन ने उस जगह व्यक्तिगत पूछताछ के बाद अपने प्रकाशित वक्तव्य में कहा है कि मृतकों की संख्या कम-से-कम पचास आँकी जा सकती है। सच्ची संख्या का अभी पता लगाना है, लेकिन अगर कम से कम संख्या को ही लीजिए तो भी इतने नि:शस्त्र पठान क्यों मारे गए? इसकी गहरी जाँच होनी चाहिए। सरकार ने जो कार्रवाइयाँ की हैं,  उन पर यह महत्त्वपूर्ण आक्षेप है कि दिल्ली-सन्धि से लेकर काले कानूनों के निकलने तक खाँ अब्दुल गफ्फार खाँ का आन्दोलन जारी था,  किन्तु किसी ने भी उनपर या उनके सथियों पर हत्या या चोट पहुँचाने का दोषारोपण नहीं किया। लेकिन इसके बजाय, जिस दिन दमन नीति प्रचलित हुई, उसी दिन चौदह से लेकर पचास नि:शस्त्र शान्त लोगों पर गोली चलाई गई और उनकी हत्या की गई, और ४ तारीख तक चार हजार एक सौ उन्तीस आदमी गिरफ्तार किए गए और जेलखाने भेज दिये गए थे। इस समय उनकी संख्या और भी बढ़ गयी होगी। संयुक्तप्रान्त और सीमान्त प्रदेश की सरकार अपनी इस दलील का उचित समर्थन करने में असफल रही है कि काँग्रेस ने सन्धि को तोडा और इसी के सन्धि के मार्ग से सरकार को विचलित होना पड़ा। इस दलील का समर्थन करने में संयुक्तप्रान्त और सीमान्त प्रदेश की सरकारें असफल सिद्ध हुई हैं। तो भी यदि सरकार उस मार्ग का अनुसरण करना ही चाहती थी, तो आपत्तिजनक कार्रवाइयों को सुधारने या रोकने के लिये महात्मा गाँधी को अवसर देती और उसके निमित्त सीमान्त प्रदेश में एक सप्ताह तक तथा संयुक्तप्रान्त में दो सप्ताह तक काला कानून स्थगित कर देती, और यदि सचमुच ऐसी स्थिति थी तो सीमान्त प्रदेश तथा संयुक्त प्रान्त की सरकार पण्डित जवाहरलाल नेहरू, श्री शेरवानी और श्री अब्दुल गफ्फार खाँ की गिरफ्तारी को रोक कर उन्हें गाँधी जी से मिलने के लिये बम्बई जाने में बाधा न देती।


नीतिपरिवर्त्तन

 

 

     श्रीमान्, अब यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार की दमन नीति काँग्रेस के अपराधों के कारण नहीं हुई है। इसका मुख्य कारण तो नीति–परिवर्त्तन है, जिसका प्रयोग सरकार ने जान–बुझकर किया है और जिसका उद्देश्य सविनय अवज्ञा–आन्दोलन का गला घोटना और काँग्रेस को कुचल का मार डालना है। जनता में स्वतंत्रता के भाव का पैदा होना, शिक्षा–सम्बन्धी सुधार तथा उच्च पदों में भारतीयों के प्रवेश आदि सभी काँग्रेस के प्रयत्न और प्रभाव के फल हैं। इसी कारण से गत पचास वर्षों से इसके जन्म-दिन से ही भारतीय सिविल सर्विस के बहुत से यूरोपीय सदस्य इसके विरुद्ध रहते हैं। इसको कुचल डालने के लिये उन्होंने अनेक बार प्रयत्न किए हैं। फिर भी उन कठिनाइयों का सामना करते हुए काँग्रेस सदा अपना सिर ऊँचा किए हुए जीवित ही रही। आपके पूर्ववर्त्ती वाइसराय ने एक वर्ष के दृढ़ शासन के बाद जब गत वर्ष काँग्रेस के साथ सन्धि करना उचित समझा तब भारत में कई सरकारी तथा गैरसरकारी ऐसे यूरोपीय थे, जो सरकार और काँग्रेस के बीच समझौता होने के विरुद्ध थे। वे गोलमेज परिषद् के भी विरुद्ध थे और उनकी यह भी इच्छा थी कि काँग्रेस को भी उसमें निमंत्रित न किया जाय। आपके पूर्ववर्त्ती वाइसराय महोदय की नीति के विरुद्ध इन लोगों ने बहुत कुछ चेष्टा की। इससे यह प्रत्यक्ष है कि सिविल सर्विस के अधिकतर यूरोपीय सदस्यों को यह बहुत ही बुरा लगा। अनुदार और विरोधियों का एक बहुत बड़ा समूह इंग्लैण्ड में सदैव इसका विरोध करता रहा। फिर भी उस समय वह नीति चालू ही रही,  क्योंकि उस समय मजदूर-सरकार के हाथ में शासन की बागडोर थी। गोलमेज परिषद् की दूसरी बैठक होने वाली थी और उसकी सफलता के लिये यह आवश्यक था कि महात्मा गाँधी और काँग्रेस उसमें भाग लें। परिषद् हुई और महात्मा गाँधी ने उसमें भाग लिया। लेकिन पार्लियामेण्ट में एक प्रबल अनुदार दल जमा था और एक बहुत अनुदार आदमी भारत-सचिव के पद पर नियुक्त हुआ था। काँग्रेस की शक्ति बढ़ी हुई थी और उसके और भी अधिक बढ़ने की सम्भावना थी। भारत के लिये पूर्ण स्वतंत्रता लिए बिना काँग्रेस जरा भी सन्तुष्ट होने वाली नहीं थी। जान पड़ता है कि आप और भारत-सचिव ने मिलकर यह तै कर लिया था कि नीति-परिवर्त्तन एवं काँग्रेस को नष्ट करने के लिये सुव्यवस्थित क्या गहरा आक्रमण करने का यह अत्यन्त उपयुक्त अवसर है। आपने ३० दिसम्बर, सन् १९३१ ई. को कलकत्ते में जो भाषण दिया था उसमें आपने इस नीति का प्रयोग करने की घोषणा करते हुए कहा था-


      ‘भारत-सरकार का नायक बनने के समय से मैंने यह अच्छी तरह समझ लिया है कि गत महीनों में भारत-सरकार की नीति को न समझ सकने के कारण सरकारी तथा गैर-सरकारी अफसरों के मन में  सन्देह और घबराहट उत्पन्न हो गई थी कि सरकार की मंशा क्या है?  अब हमारी नीति स्पष्ट है। विधान-सम्बन्धी सुधारों के सम्बन्ध में हम लोग यथासाध्य शीघ्रता के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं। लेकिन मैं यह बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि विधान-सम्बन्धी योजना में बाधा पहुँचाने-वाले असहयोग या अन्य विरोधी उद्योग तो अवश्य ही रोके जायेंगे। साथ ही देश में पूर्ण शान्ति स्थापित करने के कण्टकों तथा शासन को निर्जीव बनाने का प्रयत्न करने वाले दलों को रोकने का सब प्रकार से प्रयत्न किया जायगा,  चाहे उनका कार्य लगानबन्दी या ब्रिटिश माल और संस्थाओं के बहिष्कार या देश के कानूनों को तोड़ने के उद्देश्य से ही किया गया हो। सरकार जिस नीति से काम लेगी,  वह विशेषत: उन्हीं संस्थाओं के विरुद्ध होगी जो जान-बूझकर देश में अराजकता उत्पन्न करने एवं देश की आर्थिक उन्नति में बाधा डालने का प्रयत्न करेंगी,  और इससे जो भी परिस्थिति उत्पन्न होगी उसका सामना करने के लिये सरकार प्रान्तीय सरकारों को उचित अधिकार देने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करेगी’’।


         यह नई नीति सम्राट् की सरकार की राय से ग्रहण की गई है। जिस कठोर और दृढ़ नीति का अवलम्बन किया गया है,  उसका भारत-सचिव सर सैमुएल होर ने भरपूर समर्थन किया है। सुना जाता है कि उन्होंने यह भी कहा है कि जबतक हम लोग भारत-सरकार के लिये उत्तरदायी हैं, तबतक शासन करेंगे’’। और सरकार के द्वारा बंगाल में बरती गई कठोर व्यापक नीति का उल्लेख करते हुए उन्होंने किस निर्लज्जता के साथ कहा है कि ‘ऐसी परिस्थिति का सामना आंशिक रूप से न करके पूर्ण रूप से करना अधिक बुद्धिसंगत, सुरक्षित और मानुषिक है’। ४ जनवरी के वक्तव्य में सरकार ने जो घोषणा की है,  उससे प्रकट हो जाता है कि महात्मा गाँधी के वापस आने के पहले ही सरकार ने काँग्रेस पर आक्रमण करने का निश्चय कर लिया था और इसके लियेहले से ही अच्छी तरह सोच-समझकर पक्की योजना तैयार कर रक्खी थी। आपने महात्मा गाँधी से भेंट क्योनहीं की,  इसका भेद इसी से खुल जाता है।

 

 

दमन के साधन

 

 

            काँग्रेस पर यह इस प्रकार का आक्रमण हुआ है,  मानों उस पर हिमशिला ढकेल दी गई हो। भारत के सब भागों पर काला कानून लागू कर दिया गया है, जिससे हाकिमों को असीम शक्ति मिल गई है। जिसका फल यह हुआ है कि सारे देश में अभूतपूर्व दमन हो रहा है। केवल सन्देह के आधार पर काँग्रेस के प्रसिद्ध व्यक्तियों और कई अन्य सज्जनों की गिरफ्तारी हो गई। जो सामान्य जन गिरफ्तार होते हैं, वे पन्द्रह दिन तक हवालात में रखने के बाद कई अपमानजनक शर्तें लगाकर छोड़ दिये जाते है। एक अपमानजनक शर्त्त यह है कि प्रतिदिन कुछ निर्धारित घण्टों के बीच थाने में जाकर वे अपनी हाजिरी दें, और यदि वे ऐसा अस्वीकार करते हैं तो उनको और भी कठोर दण्ड दिया जाता है,  जो प्राय:  दो वर्ष तक कैद और जुर्माना के साथ होता है। अनुमान किया जाता है कि लगभग बीस हजार मनुष्य जेल में ठूँसे जा चुके हैं, जिनमें बहुत सी स्त्रियाँ और बहुत से बालक भी हैं। केवल काँग्रेस की संस्थाएँ ही नहीं बल्कि अनेक सेवा तथा देशभक्ति का भाव प्रदर्शन करने वाली सामाजिक तथा शिक्षा-सम्बन्धी संस्थाएँ भी गैरकानूनी घोषित कर दी गई हैं। उदाहरण के लिये राष्ट्रीय विद्यापीठ, अस्पृश्यता-विरोध समितियाँ, आदिमवासियों को उन्नत करनेवाली सभाएँ (जैसे भील-सेवा-मण्डल) तथा प्रयाग, कराँची और पेशावर में लाठी के प्रहार से घायल हुए लोगों की सेवा-सुश्रूषा के लिये बने अस्पताल आदि,  गैरकानूनी घोषित कर दिए है बहुत से स्थनों पर गोली चलाई गई जिससे लगभग पचास व्यक्ति मर राए। फौजों और हवाई जहाजों को दिखाकर देहातों और शहरों में लोगों को डराने का भी प्रयत्न किया गया है। सभा रोकने,  जलूस तोड़ने,  तथा गैरकानूनी घोषित किया हुआ शान्तिमय धरना रोकने के लिये तो खूब जी खोलकर लाठी चलाई गई है। सभाओं को सर्वथा बन्दकर इस बात की घोर चेष्टा की गई है कि कोई सरकार पर सीधा-सादा आक्षेप भी न कर सके और लोक-मत के लिये स्थान न रह जाय। बम्बई में व्यापारियों की एक सभा,  जो तीस वाणिज्य संघों की राय से की गई थी,  एकदम बन्द कर दी गई। समाचार-पत्रों पर कठिन नियंत्रण कर दिया गया है। देशी और विदेशी तारों की कड़ी जाँच होती है। कई सम्पादक गिरफ्तार हो चुके हैं। कइयों को चेतावनी मिल चुकी है कि वे सरकार पर होने वाले आक्षेपों को न छापें और न नेताओं के फोटो छापें। कई जमानतें जब्त हो चुकी हैं और कई प्रेस छीन लिए गए हैं। काँग्रेस का धन जब्त कर लिया गया है। उस निजी धन को भी सरकार ने छीन लिया है,  जिस पर सन्देह था कि उसका उपयोग काँग्रेस के कामों मे किया जायगा। सरकार के वक्तव्यों में,  एन्गलो-इण्डियन पत्रों में, सूचना-विभाग के संचालकों के वक्तव्यों में अन्धाधुन्ध प्रचार हो रहा है। उनसे काँग्रेस के नेताओं को बदनाम किया जाता है और उनके विषय में भ्रमपूर्ण बातें फैलाई जा रही हैं। समाचार भी दबा दिए जाते हैं। विशेषकर सीमान्त प्रदेश के कांग्रेस-जनों को ठहरने का स्थान,  भोजन और सवारी देने के लिये जनता को त्रस्त करने तथा उनमें घोर आतंक फैलाने के लिये कैदियों के साथ कठोर व्यवहार किया जा रहा है,  और काँग्रेस के सहायकों को सताया जा रहा है। मनमाना बहाना कर घरों और संस्थाओं की तलाशी ली जाती है। नेताओं तथा अन्य लोगों को घर से बाहर न जाने की नोटिस दी जाती है। आन्दोलन से विमुख रहने के लिये संघ के संचालक तथा व्यक्तिविशेष,  प्राय: व्यवसायी संस्थाओं को काँग्रेस के सेवकों के साथ व्यवहार न रखने की जो चेतावनी दी जाती है, उससे व्यापार में बहुत बाधा पड़ रही है। सरकार की दमन-नीति के विरोध में विशेष-विशेष अवसर पर दुकान बन्द करने के अभियोग में बेचारे दुकानदार गिरफ्तार कर लिए जाते हैं।

 


 

परिणाम

 

       दमन-नीति का यह प्रभाव पड़ा है कि जिसके हृदय में थोड़ा भी जन-सेवा का भाव है, वे सशंक और भयभीत हो गए हैं। उनमें उत्तेजना फैल गई है,  और वे तन-मन-धन से देश-सेवा करने के लिये कटिबद्ध हो गए हैं। बहुत से सरकार के पक्ष वाले लोग उसका साथ छोड़ रहे हैं। भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक सभाएँ हो रही हैं,  जलूस निकाले जा रहे हैं। यद्यपि स्त्रियों के साथ पहले से अधिक कड़ा व्यवहार हो रहा है, और उनको कड़ी सजाएँ दी जा रही हैं,  तथापि वे देश के लिये प्राणों की आहुति देने के लिये दुगने उत्साह से संघटित और उद्यत होती जा रही हैं। जिन्होंने आज तक कभी राजनीति में भाग नहीं लिया है, वे भी इस अत्याचार को असह्य समझ रहे हैं।


      जब से आपकी वर्त्तमान नीति चालू हुई है, तब से जनता पर जो असंख्य अत्याचार हुए हैं, उनका संक्षिप्त विवरण भी आपके सामने रखने में मैं असमर्थ हो गया हूँ। समाचार-पत्रों पर नियत्रण होते हुए भी जो नित्य-नित्य पत्रों में समाचार निकलते हैं, उनसे स्पष्ट व्यक्त होता है कि दमन कैसे भयंकर रूप से नग्न ताण्डव कर रहा है। अपनी नीति से आपने न तो शान्ति बढाई और न सुशासित प्रबन्ध ही दिखलाया है। बल्कि उससे आपने देश के कानून, शान्ति और जनता की शान्ति को बुरी तरह से क्षुब्ध कर डाला है। आपकी सरकार की शिकायत है कि व्यापार चौपट हो गया है, बाजार बहुधा बन्द हो जाते हैं, और जबतक इस निति के चालू होने से पहले की दशा देश में नहीं आ जाती है, तबतक व्यापारियों ने अपना काम स्थगित कर रक्खा है। जान पड़ता है कि आप इस बात पर ध्यान ही नहीं देते हैं कि भारतीयों के मन में इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है कि सरकार ने महात्मा गाँधी को अन्यायपुर्वक बन्द कर रक्खा है और कई प्रतिष्ठित देशभक्तों को बन्द कर रक्खा है, जिनमें महात्मा गाँधी धर्मपत्नी कस्तूरीबाई और अन्य देशभक्त भारतीय स्त्रियाँ भी हैं। उनका अपराध केवल यही है कि वे स्वदेश-प्रेमी हैं और स्वतंत्रता चाहती हैं।

          

 सविनय अवज्ञा

 

        सरकार ने सविनय अवज्ञा की निन्दा की है और उसको नष्ट करने का निश्चय भी प्रकट किया है। पर क्या उसने यह भी सोचा है कि लोगों पर इसका क्या प्रभाव होगा?  क्या श्रीमान् मुझे बतलाने की कृपा करेंगे कि वर्त्तमान स्थिति में भारतीय लोग किस माँग का अवलम्बन करें  कि भारत-सरकार अपनी वह नीति छोड़े या सुधारे,  जिसे भारतीय लोग दमनकारी,  अन्याययुक्त्त तथा देशहित का विरोधी समझते हैं?  जनता इस बात का अनुभव कर रही है कि सरकार ने अपने अधिकार का दुरुपयोग किया है, और एक निश्चित योजना के रूप में  देश भर में वह अत्याचार कर रही है, और भारत के पूज्य नर-नारियों को जेल में बन्द कर रही है, और अपने कार्यों के विरुद्ध लोगों का मुँह बन्द कर रही हैं,  और वह भी उस समय हुआ है,  जब अपना मन्तव्य आपके सामने रखने के लिये महात्मा गाँधी ने आपसे अवसर माँगा और आपने उसे इनकार कर दिया। महात्मा गाँधी ने भारतीयों को भी मनुष्य समझ कर सरकार तथा जनता के बीच में मनोमालिन्य मिटाने के लिये ऐसा किया था। फिर आप उनसे चाहते हैं कि वे किस मार्ग पर चलें?  क्या वे चुपचाप निस्सहाय होकर अत्याचारं सहते रहें?  किन्तु यह कहाँ तक सम्भव है? ज्यों-ज्यों लोग यह अनुभव करते जा रहे हैं कि हमारा जीवन दूभर और असह्य होता जा रहा है,  त्यों-त्यों जनता इससे उत्तेजित होती जा रही है। ऐसी दशा में आप जनता के विचारों को हिंसा और उपद्रव की  ओर मोडेंगे या उनको यह सोचने का अवसर देंगे कि सत्य,  निर्भयता,  अहिंसा, त्याग और सविनय अवज्ञा के द्वारा ही उनको अपना लक्ष्य प्राप्त हो सकता है,  और उनके दु:खों का निवारण हो सकता है? इस सिद्धान्त के अनुसार जो मनुष्य आज्ञा की अवहेलना करता है,  वह अपने अत्याचारी पर कोई चोट नहीं  पहुँचाता,  बल्कि अपने ऊपर शान्तिपूर्वक अत्याचार सहकर उसको अपने विचार की ओर मोड़ने का प्रयत्न करता है। जातीय अभिमान अथवा जातीय लाभ के लोभ में पड़कर इस साधन के गुणों की ओर से आँख न मूँदिए। ईश्वर की कृपा से यह बड़े भाग्य की बात है कि हम लोगों के साथियों में से एक को युद्ध की बुराई से बचने तथा अपना स्वत्त्व प्राप्त करने का मार्ग दिखलाने की प्रेरणा प्राप्त हुई है। एक मानवीय और सयानी सरकार को इसका स्वागत करना चाहिए,  और उसे और भी प्रोत्साहन देना चाहिए, न कि उसे नष्ट करने की उग्र चेष्टा करनी चाहिए। इस प्रकार के घोर विधानों से लोगों को यह सोचने के लिये विवश नहीं करना चाहिए कि युद्ध और हिंसा को प्रथा ही अधिकार प्राप्त करने के लिये उचित साधन हैं। सब स्त्री और पुरुष उसी पर अग्रसर हों।


       इसलिये मैं आपसे तथा आपकी सरकार से अनुरोध करूँगा कि सविनय अवज्ञा के सम्बन्ध में आपकी जो नीति है,  उसे बदलें। यह उतनी बुरी नहीं है जितना आप समझते हैं। सच तो यह है कि अपने वास्तविक अधिकारों की रक्षा करने के लिये जनता के हाथ में यही एक अमूल्य और शिष्ट साधन है। मजिस्ट्रेट होने से ही उसकी आज्ञा निर्दोष नहीं मानी जा सकती। बहुत सम्भव है कि साधारण स्थिति में कोई मूर्खतापूर्ण आज्ञा दे दी जाय। कोई भी नागरिक बिना किसी दण्ड के उसकी अवहेलना कर सकता है। भारतीय दण्ड-विधान (इण्डियन पीनल कोड) के रचयिताओं ने इस बात को माना है,  और उसके लिये प्रबन्ध भी कर दिया है। उक्त विधान की एक सौ चवालीसवीं धारा के अनुसार एक सरकारी कर्मचारी को अधिकार है कि वह किसी को कोई खास काम करने से रोक सकता है और अपने अधिकार में किसी विशेष सम्पत्ति को ले सकता है, और धारा १८८ के अनुसार इस आज्ञा की अवहेलना दण्डनीय है। किन्तु उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह अवहेलना तभी दण्डनीय हो सकती है जब कि इसका फल बुरा हुआ हो। लॉ कमिश्नरों ने १८८ धारा पर अपनी टिप्पणी करते हुए इसे और भी स्पष्ट कर दिया था। उन्होंने कहा है-


      “जैसा कि हम लोगों ने दिखलाया है,  एक ओर तो यह अति आवश्यक है कि कुछ स्थानीय कानून रक्खे जायँ,  जिसके लिये व्यवस्थापिका सभा की अनुमति लेना आवश्यक न हो,  और दूसरी ओर हम यह जानते हैं कि ऐसे कानूनों को बनाने वाले चाहे जितने भी बुद्धिमान हों,  इससे छोटे-मोटे बहुत से अत्याचार और कष्ट होने की सम्भावना है। शासन में बाधा डालने का भाव जनता के सुख के लिये परम अनिष्टकर है। यह तो अनुभव-सिद्ध बात है कि प्राय: यह भाव अच्छे विचारों,  अपूर्व शक्ति तथा जाति की भलाई करने की सच्ची लगन के साथ ही मौजूद रहता है। अगर किसी कर्मचारी में साधारण उत्साह से अधिक उत्साह हो और उसमें न्याय-बुद्धि का अभाव हो, तो वह अपनी आशंका और आवश्यक बन्धनों से जनता की हानि कर सकता है। इसलिये हम लोगों ने यह आवश्यक समझा है कि इस बात का प्रबन्ध हो कि इस आज्ञा की अवहेलना के लिये तबतक किसी को दण्डित न होना पड़े जबतक यह सिद्ध न हो जाय कि उससे हानि हुई है अथवा उससे हानि होने की सम्भावना थी। इसलिये कोई भी व्यक्ति मुर्खतापूर्ण आज्ञाओं की अवहेलना के लिये दण्डनीय नहीं होगा।"


       यदि किसी नागरिक को मूर्खतापूर्ण आज्ञा न मानने का अधिकार है, तो जो आज्ञा दु:खदायी एवं  अपमानजनक है, उसके तोड़ने का नैतिक अधिकार और भी प्रबल है। क्या उस मनुष्य को आप दोषी ठहरायेंगे, जो इस प्रकार की आज्ञा के विरुद्ध आवाज उठाता है और उसकी अवहेलना करता है? यदि इन विचारों का प्रभाव आप पर तथा इंग्लैण्ड में आपके साथियों पर नहीं पड़ता है, तो मैं कहूँगा कि केवल दूरदर्शिता की दृष्टि से आपको यह वर्त्तमान नीति छोड़ देनी चाहिए। यह नीति बिल्कुल व्यर्थ है। जब भारत-सचिव ने अपनी यह पुरानी बात दुहराई कि,  ‘जब हम लोग भारत के उत्तरदायी हैं तब हम उस पर शासन करेंगे’, तब उनको इस बात का ज्ञान था,  जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा भी है,  कि वह प्रथा अब पुरानी हो गई। इस प्रकार लोगों पर शासन करने के दिन गए। ब्रिटिश सरकार एक विदेशी सरकार  है। उसको भारत में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। यदि यह एक राष्ट्रीय सरकार भी होती तो भी संसार की इस उन्नत अवस्था में वह इस प्रकार का बहुत दिनों तक शासन न करने पाती। लोग उसे ठहरने ही न देते। उन्होंने अपने निश्चय का काफी परिचय दे भी दिया है। महात्मा गाँधी ने सन् १९२० ई. में इस आन्दोलन को चलाया। सन् १९२१ इं. में सरकार ने इस कांग्रेस को गैर-कानूनी घोषित कर दिया। महात्मा गाँधी जी ने इस घोषणा की अवज्ञा की,  क्योंकि उनकी दृष्टि में यह अनुचित थी। ऐसा करने से लगभग पच्चीस सौ भारतीय स्वेच्छापूर्वक जेल चले गए। आपके पूर्ववर्त्ती वाइसराय महोदय आपसे किसी प्रकार भी भीरू नहीं थे। हम लोग उनकी दमन-नीति के लिये निन्दा करते हैं। उन्होंने वीर पुरुष की नीति का अनुसरण किया। उन्होंने जब देख लिया कि सरकार के काले कानून,  घोषणा, आज्ञा और कानून को तोड़कर नर-नारी गोली सहने के लिये भी तैयार हैं, और एक वर्ष में लगभग नब्बे हजार व्यक्ति ऐसा करने से जेल चले गए,  तब उन्होंने उस सन्धि की नीति का आश्रय किया, जिसके फलस्वरूप दिल्ली की सन्धि हुई थी। मैं आपको विश्वाश दिलाता हूँ कि स्वतंत्रता प्राप्त करने का निश्चय अब पहले से भी कहीं अधिक प्रबल है, और पहले से भी कहीं अधिक कानून और आज्ञाएँ तोड़ी जायँगी। जबसे इस दमन-नीति का पल्ला पकड़ा गया है, तबसे इतने कम समय में गिरफ्तार व्यक्तियों की संख्या और भी आगे बढ़ जायगी। और आपको इसका फल क्या मिलेगा?  नष्ट होना तो दूर रहा,  सविनय अवज्ञा आन्दोलन और भी प्रबल होगा और जो कष्ट लोगों को सहने पड़ेंगे,  उससे यह और भी दृढ़ होगा। लोगों की भावना सरकार के विरुद्ध पहले से और भी अधिक पुष्ट हो जायगी। पुर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने का भाव और भी दृढ़ हो जायगा। अन्त में सन्धि के सिवाय आपके पास कोई और चारा नहीं रह जायगा। जब यह निश्चित है कि आपकी फिर पीछे पाँव हटाना पड़ेगा,  तब इसमें कौन सी बुद्धिमानी है कि जनता को इतने कठोर दु:ख दिए जायँ और उनकी इतनी हानि की जाय?


        निश्चय ही काँग्रेस को नष्ट करने का यत्न निष्फल सिद्ध होगा। आप शायद भारत की राजनीतिक आत्मा की हत्या करने की बात सोचते होंगे। पर मुनासिब तो यह है कि आप इसके प्रभाव को मान लें और इसका सहयोग प्राप्त करें। यही सरकार के लिये उचित मार्ग है। आज और सदा यह सम्मानित शर्त्तों पर सहयोग देने के लिये उत्सुक रही है।


        आप और भारत-सचिव ने अपनी नीति की घोषणा करते हुए कहा था कि शान्ति और व्यवस्था की रक्षा के लिये हम लोग चाहे जिस मार्ग का अवलम्बन करें या उसके लिये अनुमति दें, परन्तु वह नये शासन-विधान में बाधक  नहीं होगा। निश्चय ही सरकार के निर्देश के अनुसार तथा इस नीति के अनुकूल प्रान्तीय गवर्नर तथा जिले के अधिकारियों ने लोगों पर दबाव डाला है। सर सैमुएल होर ने कहा था कि दमन–नीति ग्रहण करने और गोलमेज परिषद् के लिये समिति भेजने में मैं कोई भी विरोध नहीं देखता, परन्तु महात्मा गाँधी एवं अन्य काँग्रेस के आदमियों की गिरफ्तारी की जो नीति है,  उससे स्पष्ट होता है कि सरकार लोगों को नपुंसक बनाना चाहती है,  जिससे वे उस विधान को चुपचाप स्वीकार कर लें,  जिससे उनको स्वतंत्रता का कोई कण भी नहीं मिलता, बल्कि उससे भारत पर इंग्लैण्ड के राज्य की अवधि और भी बढ़ जाती। यद्यपि यह एक गम्भीर दोषारोपण है, लेकिन मैं कह सकता हूँ कि आजकल लोगों का प्राय: वही विचार है,  और जबतक आपकी यह नीति बनी रहेगी,  तबतक उनको यह विश्वास दिलाना कठिन है कि बात ऐसी नहीं है।


       ऊपर बताए हुए सभी कारणों से मैं आपसे और आपके द्वारा ब्रिटिश सरकार से बड़े विनय के साथ अनुरोध करता हूँ कि दमन-नीति का अवलम्बन करके आपने जो भारी भूल की है उसको सुधारें, काले कानूनों को वापस ले लें और महात्मा गाँधी तथा इस नीति के अनुसार जो लोग कैद किए गए हैं, उन सभी स्त्री पुरुषों तथा बालकों को मुक्त कर दें। जो जुर्माने वसूल हो चुके हों,  वे लौटा दिए जायँ तथा देश में फिर कानून का राज्य स्थापित किया जाय। जिन विशेष बातों के विषय में कुछ प्रान्तों में सरकार और जनता में मतभेद है, उन्हें तै करने के लिये महात्मा जी तथा अन्य काँग्रेस-नेताओं को सरकार निमंत्रित करे और सब लोग मिलकर उन स्थानों में जाकर सब तरह से सन्तोषजनक स्थिति उत्पन्न करने का प्रयत्न करें, और जब आप इस प्रकार शान्त परिस्थिति उत्पन्न कर चुकें, तब महात्मा गाँधी और अन्य व्यक्तियों को शासन-सुधार-सम्बन्धी बड़े प्रश्नों पर विचार करने के लिये निमंत्रित करें,  और उन्हें भारत के लिये ऐसा शासन-विधान बनाने के प्रयत्न में सहायता करने का अवसर दें,  जिससे उसे ग्रेट ब्रिटेन की बराबरी का यश प्राप्त हो जाय। और इस प्रकार इंग्लैण्ड और दोनों के लिये सम्मानजनक और हितकर हो।


        मैं परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ कि वह आपको तथा सम्राट् की सरकार को सुबुद्धि और साहस दे कि यह सिद्ध हो जाय।


आपका हितैषी


मदन मोहन मालवीय,



सेवा में,

परम सम्माननीय लॉर्ड विलिन्गटन, भारत के गवर्नर–जनरल, दिल्ली

Mahamana Madan Mohan Malaviya