Mahamana Madan Mohan Malaviya

Mahamana Madan Mohan Malaviya
Speeches & Writings

राष्ट्रभाषा

पश्चिमोत्तर प्रदेश व अवध की कचहरियों तथा पाठशालाओं में

हिन्दी भाषा-लिपि का प्रवेश

 

कचहरियों तथा प्रारम्भिक पाठशालाओं में फारसी लिपि के स्थान पर देवनागरीलिपि का प्रचार कराने के लिये संयुक्तप्रान्त के गवर्नर सर एण्टोनी मेकडोनलकी सेवामेभेजने के लिये पूज्य मालवीयजी ने जो (मेमोरेण्डम) अभ्यर्थना लेख लिखा था। उसे६० हजार जनता के हस्ताक्षरों के साथ २ मार्च सन् १८९८ ई. को दिन के १२ बजेगवर्नमेण्ट हाउस प्रयाग में पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध के गवर्नर सर एण्टोनीमेकडोनल की सेवा में उपस्थित किया गया था। उस पर १५ अप्रैल १९०० ई. को स्वीकृति मिली और राजाज्ञा जारी हुई।                                         

-सम्पादक

मुसलमानोंके भारतवर्ष में आने के समय भारत की देश-भाषा हिन्दीऔरलिपि नागरी तथा उसके रूपान्तर थे, और उसी के द्वारा सब काम चलता था। यद्यपिभारतवासी फारसी नहीं जानते थे फिर भी मुसलमानी राज्य के प्रारम्भ से लेकर अकबरके राज्य के मध्य तक माल-विभाग में हिन्दी का और दीवानी तथा फौजदारी कचहरियोंमें फारसी भाषा का प्रयोग होता था। ब्रिटिश राज्य की स्थापना के बाद कुछ समय तकइसी भाषा से काम चला, पर थोड़े ही दिन बीतने पर यह सोचा गया कि सारी अदालतोंऔर सारे सरकारी दफ्तरों में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाय, परन्तु यह प्रस्तावब्रिटिश राज्य के नायकों को रोचक न हुआ। यहाँ तक कि कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स नेअपने २९ सितम्बर सन् १८३० ई. के आज्ञापत्र में यह स्पष्ट कह दिया कि "यहाँ केनिवासियों को जज की भाषा सीखने के बदले जज को ही भारतवासियों की भाषासीखना बहुत सुगम होगा। अतएव हम लोगों की सम्मति है कि न्यायालयों का समस्तलिखित व्यवहार उस स्थान की भाषा में ही हो।"

किन्तु इस आदेश का पालन १८३७ ई. के पूर्व न हो सका। इसी बीच इसविषय पर बड़ा विवाद भी चला। कुछ लोगों की यह सम्मति थी कि अंग्रेजी का हीप्रयोग हो,कुछ यह चाहते थे कि फारसी के स्थान पर यहाँ की देशभाषा का ही प्रयोग हो, परन्तु लिपि रोमन हो। सरकार को इन दोनों में से कोई भी विचार पसन्द न आया।सरकार ने यह सोचा कि विदेशी भाषा और लिपि के प्रचार से अदालतों का काम ठीक-ठीक और उत्तम रीति से न चल सकेगा और लोगों को न्याय पाने में कठिनता होगी,इसलिये कोर्ट ऑफ डांइरेक्टर्स की सम्मति के अनुसार यह निश्चय किया गया कि कचहरी और माल सम्बन्धी सारा काम फारसी के बदले यहाँ की देश-भाषा में हुआ करे और अंग्रेजी का प्रयोग सरकारी अफसर लोग केवल ऐसी चिट्ठी-पत्रियों में किया करेंजिनका सर्वसाधारण से कोई सम्बन्ध न हो। सदर बोर्डऑफ रेवेन्यू के मंत्री ने तारीख ३० मई सन्१८३७ ई. को इस आशय का आज्ञापत्र निकाला। बंगाल सरकार के मंत्री ने जो पत्र(नं. ९१४) ३० जून सन् १८३७ ई. को सदर बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के नाम लिखा था, उसमें इस आज्ञा को और भी स्पष्ट कर दिया। उसमें लिखा था कि श्रीमान् गवर्नर महोदय इस बात को स्पष्ट रूप से समझा देना चाहते हैं कि केवल यूरोपीय अफसरों के आपस के पत्र-व्यहवार को छोड़कर (जो अंग्रेजी में हुआ करें) प्रत्येक विभाग में सरकारी काम देश-भाषा में हो।" इस आज्ञा के विरोध में जो कानून था उसे रद्द करने के लिये एक बिल श्रीमान् वाइसराय की व्यवस्थापक सभा मेंउपस्थित किया गया, जिससे फारसी के स्थान पर देषा-भाषा के प्रचार की आज्ञा स्थिर हुई। इस विधान के अनुसार बंगाल में बंगाली तथा उड़ीसा मेंउड़िया भाषा का प्रचार हुआ। हिन्दुस्तान के अन्तर्गत बिहार, पश्चिमोत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश का कुछ भाग है।वहाँ की भाषा हिन्दी थी जो नागरी लिपि या उसके अन्य रूपों में लिखी जाती है| परन्तुइस भाषा के बदले इन प्रान्तों की कचहरियों में उर्दू-भाषा का प्रचार हुआ। इसकाकारण यह था कि यूरोपीय लेखकोने उर्दू-भाषा को हिन्दुस्तानी नाम दे दिया, जिससेयह समझा गया कि बंगाल कीभाषा बंगाली तथा गुजरात की भाषा गुजराती है, वैसे ही हिन्दुस्तान की भाषा भी हिन्दुस्तानी है। इस भूल से हिन्दुस्तान की कचहरियों मेंउर्दूका प्रचार हुआ। इस भूल का संशोधन सन् १८८१ ई. में बिहार में हुआ। तब से वहाँनागरी या कैथी अक्षरों का प्रचार है। उसी वर्ष मध्यप्रदेश में भी यह भूल सुधारी गईऔर वहाँ हिन्दी-भाषा और नागरी अक्षरों का प्रचार हुआ। पश्चिमोत्तर प्रदेश में अभीइसका सुधरना रह गया है और बहुत से कारणों से अब इस कार्य में विलम्ब करना आवश्यक नहीं जान पड़ता।

यह कहा जा चुका है कि पश्चिमोत्तर प्रदेश की भाषा हिन्दी थी और अबभी है और यह नागरी लिपि में लिखी जाती है। पश्चिमोत्तर प्रदेश की सरकार के मंत्री ने ता.१७ अगस्त सन् १८४४ इं. को (पत्र संख्या सातसौ पचास) में आगरा कॉलेज के प्रिन्सिपल को लिखा था कि यहाँ की देश-भाषा हिन्दी है|पश्चिमोत्तर प्रदेश के स्कूलोंके डाइरेक्टर जनरल ने सन् १८४४-४५ विवरण में लिखा है कि “हिन्दी सबसे अधिक प्रचलित भाषा है।" बोर्ड ऑफ रेवेन्यूने भी सन् १८३७ ई.के आज्ञापत्र (संख्या ८)में इसी कथन का समर्थन यों किया है:- "बोर्ड इस अवसर पर कमिश्नर और कलेक्टरों की उस आज्ञा (संख्या ४११,ता. ३० सितम्बर सन् १८५४ ई.) का ध्यान दिलाती है जिसके अनुसार पटवारियों के कागज उस भाषा और उस लिपि में लिखे जाने चाहिए जिनको सर्वसाधारण काश्तकार और जमीन्दार भलीभाँति समझते हों। प्राय: वह भाषा हिन्दी और वह लिपि नागरी होगी।" शिक्षा-विभाग के सन् १८७३-७४ केविवरण पर सरकार ने आज्ञा देते समय लिखा है कि "हिन्दी यहाँकि मातृभाषा कहीजा सकती है,क्योंकि अधिकतर लोग उससे भलीभाँति परिचित हैं।"

शिक्षा-विभाग के डाइरेक्टरों ने भी सन् १८७७-७८ के विवरण मेलिखा हैकि हिन्दी ही इस प्रदेश की देश-भाषा है

सन् १८४८ ई. में एक महाशय कलकत्ता रिव्यूमें लिखते हैकि हिन्दी केव्यवहार की ठीक-ठीक सीमा निर्धारित करना कुछ सुगम कार्य नहीं है। मोटे तौर से यहकहा जा सकता है कि इसका प्रचार बिहार, अवध, राजपूताना और उन सब प्रदेशों में है जोपश्चिमोत्तर प्रदेश के लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधीन हैं। एक यात्री ने कहा है किहिन्दी की सहायता से वे समस्त भारतवर्ष मेघूम सकते हैं।

शिक्षित मुसलमान उर्दूबोलते हैं,परन्तु साधारण काश्तकार या अन्य मुसलमानअधिकतर हिन्दुओं की ही तरह बोलते हैं।

प्रसिद्ध डॉक्टर राजेन्द्रलाल मित्र बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के जरनल(१८६४ ई.) मेहिन्द की भाषा की उत्पत्ति और उर्दू बोली से उसका सम्बन्धशीर्षक लेख मेलिखते हैं कि भारतवर्ष की देशभाषाओंमेहिन्दी सबसे प्रधान है। बिहारसे सुलेमान पहाड़ तक और विन्ध्याचल से हिमालय की तराई तक सभ्य हिन्दू-जातिकी यही मातृभाषा है। गोरखा जाति ने इसका कुमायूँ और नेपाल में भी प्रचार कर दियाहै और यह भाषा पेशावर से आसाम तक और काश्मीर से कन्याकुमारी तक के सब स्थानोमें भलीभाँति समझी जा सकती है।

श्रीयुत् बीम्स ने भी इसी मत का समर्थन किया है, तथा रेवरेण्ड कैलॉग भीलिखते हैं कि पच्चीस करोड़ भारतवासियों में से एक चौथाई, अर्थात् छ:या सातकरोड़ मनुष्यों की मातृभाषा हिन्दी है। ........ २४८००० वर्गमील में जनसाधारण कीभाषा हिन्दी ही है। श्रीयुत् पिनकॉट महोदय लिखते हैं कि उत्तरीय भारतवर्ष की भाषासदा से हिन्दी थी और अब भी है और इसी भाषा के अधिक प्रचार के कारण लोग यह समझते हैं कि साधारण हिन्दुस्तानी भारतवर्ष की मातृ-भाषा हैं।

इस विषय पर अब अधिक कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं है। जो कुछऊपर लिखा जा चुका है उससे यह स्पष्ट है कि जिस समय सरकार ने फारसी के बदलेदेशभाषा के प्रचार की आज्ञा दी थी उस समय पश्चिमोत्तर प्रदेश की मातृभाषा हिन्दी थी,और अब तक वही है। इस समय की हिन्दी फारसी के शब्दों से भरी हुई है। उसे हीअब उर्दू कहते हैं। उसका प्रचार कचहरियों से अधिक सम्बन्ध रखने वाले शिक्षितमुसलमानों और अमलों में ही अधिक है। फारसी, अरबी और तुर्की शब्दों के भार सेलदी हुई यह हिन्दी ही अब उर्दूक़हलाती है तथा फारसी लिपि में लिखे जाने से यह और भी अधिक अस्पष्टहो गई है। इस कारण अबतक भी इन प्रान्तों के निवासियों की समझ में यह भली प्रक्रार नहीं आती। परन्तु जैसा किऊपर कहा जा चुका है पश्चिमोत्तरप्रदेश की सदर दीवानी अदालत ने भूल से उर्दू को यहाँ की देश-भाषा समझकर फारसी के स्थान पर उसके व्यवहार की आज्ञा दे दी। उस उर्दूभाषा को वे हिन्दुस्तानीकहने लगे और यह स्पष्ट रूप से घोषित कर दिया गया था कि कचहरियों की कार्रवाईऔर वकीलों की बहस सर्वबोध और सरल उर्दू में (या हिन्दी में, जहाँ उसका प्रचार हो) लिखी जाय। यह भाषा ऐसी होनी चाहिए जिससे फारसी से सर्वथा अनभिज्ञ एककुलीन भारतवासी अपनी साधारण बात-चीत में प्रयोग करता हो। इसमें कोई सन्देहनहीं है कि इस आज्ञा को देने के समय सदर दीवानी अदालत को यह इच्छा थी किकचहरियों का काम ऐसी भाषा में हो जिसे सर्वसाधारण सुगमता से समझ सकें। हिन्दीके प्रयोग के लिये जो आज्ञा दी गई थी उस पर कुछ भी ध्यान न दिया गया। बहुत दिनोंतक फारसी से भरी हुई उर्दूलिखते चले आने से अमलोंको ज़नसाधारण की भाषा कोनागरी लिपि में लिखना भद्दा जान पड़ा और इसी से इस प्रान्त की कचहरियों में उर्दूभाषा और फारसी अक्षरों का प्रचार हुआ।

इस आज्ञा का फल अत्यन्त ही असन्तोषदायक हुआ, क्योंकि इसके एक हीवर्ष उपरान्त बोर्ड ऑफ रेवेन्यूको पुन: आज्ञापत्र निकालना पड़ा और उसमें पुन: इसबात पर जोर दिया गया कि फारसी-पूरित उर्दून लिखी जाय बल्कि ऐसी भाषा लिखीजाय जो एक कुलीन हिन्दुस्तानी, फारसी से पूर्णतया अनभिज्ञ रहने पर भी बोलता हो।परन्तु इस २८ आस्त सन् १८४० ई. के आज्ञापत्र का भी कोई परिणाम न हुआ। इसकेपन्द्रह वर्ष उपरान्त सरकार ने देखा कि दीवानी, फौजदारी और कलेक्टरी (माल)कचहरियों का कामकाज अभी तक एक ऐसी कठिन और विदेशी भाषा में हो रहा हैजो फारसी से प्राय: मिलती जुलती है। अतएव सदर दीवानी अदालत और बोर्ड ऑफरेवेन्यूकी सम्मति लेने के उपरान्त सरकार ने यह पुन: आवश्यक समझा कि कचहरियोंके अफसरों को इस बात को फिर से ताकीद की जाय कि सरकारी कागज ऐसी भाषामें लिखे जायँ जिन्हेसर्वसाधारण भलीभाँति समझ सकें। इस सिद्धान्त के अनुसार ता.९ मई सन् ९८५४ ई. को इसी आशय का एक आज्ञापत्र निकाला गया। परन्तु इसकाभी प्रभाव न हुआ। सरकार ने पुन: सन् १८७६ ई.में सब जिलों के हाकिमों के नाम एक आज्ञापत्र भेजा, और देशभाषा के प्रयोग किए जाने के लिए और भी स्पष्ट रूप सेजोर दिया। पर इसका भी कुछ परिणाम न हुआ।

आज इस आज्ञा को निकले इक्कीस वर्ष हो चुके,परन्तु अभी तक कचहरियोंकी भाषा की वही अवस्था है जो साठ वर्ष पहले थी, जबकि पहले पहल सरकार नेसन् १८३७ ई. में ऐसी सुबोध और सरल भाषा के प्रचार की इच्छा प्रकट की थी जिसे सर्वसाधारण सुगमता से समझ सकें। केवल सरकार ही यह नहीं चाहती थी और केवल फारसी-मिश्रित उर्दू के दोषों को समझकर ही उसका विरोध नहींकरती थी बल्किबड़े-बड़े भाषाशास्त्रज्ञों ने भी सरकार की उस शुभ इच्छा का समर्थनकिया है |डॉक्टरफैलन ने अपने शब्दकोश में अरबी और फारसी शब्दों के समानार्थी हिन्दी के साधारण शब्दों को रखकर इस बात को पूर्णतया सिद्ध कर दिया है कि कचहरी के कागजों में अरबी और फारसी-मिश्रित उर्दू लिखने का कोई सन्तोषजनक कारण नहीं है।

श्रीयुत् ग्राउस इसी विषय पर लिखते हैं कि आजकल की कचहरी की बोलीबड़ी कष्टदायक है, क्योंकि एक तो यह विदेशी है और दूसरे इसे भारतवासियों काअधिकांश नहीं जानता। ऐसे शिक्षित हिन्दुओं का मिलना कोई कठिन बात नहीं है जोस्वत: इस बात को स्वीकार करेंगे कि कचहरी के मुंशियों की बोली को वे अच्छी तरहबिलकुल नहीं समझ सकते और उसे लिखने में तो वे निपट असमर्थ ही हैं। इसका बड़ाभारी प्रमाण तो यह है कि कानूनों और गश्ती चिट्ठियोंके सरकारी भाषानुवाद को तबतक कोई भी भलीभाँति नहीं समझ सकता जबतक कि कोई व्यक्ति अंग्रेजी सेमिलाकर उन्हें न समझा दे।

मिस्टर फ्रेड्रिक पिनकॉट ने अफसरों की हिन्दुस्तानी भाषा के विषय में लिखाहै कि जिन भारतवासियों की यह मातृभाषा बताई जाती है उन्हेइसे अंग्रेजी की तरहस्कूलों में सीखना पड़ता है। और भारतवर्ष में यह विचित्र दृश्य देख पड़ता है कि राजाऔर प्रजा दोनों अपना व्यवहार ऐसी भाषा द्वारा करते हैं जो दोनोमें से एक की भीमातृभाषा नहीं है। उस विषमता से जो असुविधाएँ उत्पन्न होती हैं उन्हेंदूर करने केलिये कुछ भारतवासी यह मानने लगे हैं कि सब व्यवहार अंग्रेजी भाषा में ही होनाचाहिए। उनका विश्वास है कि इस भाषा के प्रयोग से राज्य कर्मचारियों को भी सुगमताहोगी और यहाँ के लोगोको भी हिन्दुस्तानी से कुछ ही कठिन भाषा सीखनी पड़ेगी।

यहाँ यह पूछा जा सकता है कि साठ वर्ष तक कचहरियों में सरल भाषा केप्रचार का उद्योग करते रहने पर भी सरकार क्यों कृतकार्य न हुई? बार-बार आज्ञा देनेपर भी अभी तक कचहरियों के कागज ऐसी भाषा में क्यों लिखे जाते हैंजो बिना किसीआवश्यकता के फारसी और अरबी शब्दों से भरी रहती है। इसका कारण यही है किअदालतों का काम फारसी लिपि में होता है। सरकार की इच्छा तबतक कदापि पूर्ण नहो सकेगी जबतक अदालतों में फारसी अक्षरों का आधिपत्य रहेगा। आज इनके स्थानपर नागरी अक्षरों का प्रचार कीजिए और तब देखिए कि साथ-ही-साथ सरल औरसुगम हिन्दुस्तानी का प्रचार होता है या नहीं? पायनियर पत्र ने अपने १० जनवरीसन् १८७६ ई. के अंक में लिखा है कि "फारसी लिपि और फारसी भाषा में इतनाघनिष्ठ सम्बन्ध है कि इस विषय ( भाषा) का सुधार तबतक पूर्णतया हो ही नहीं सकताजबतक कि हिन्दी भाषा-भाषी प्रान्त के गैर सरकारी गवाहों के वयान नागरी अक्षरों मेंन लिखे जायेंगे। स्वर्गीय श्री फ्रेड्रिक पिनकॉंट ने इसी मत का जोरदार समर्थन किया है।विचारशील हिन्दुओं ने सन् १८३७ ई. में इसी आशय का एक निवेदन-पत्र भी सरविलियम म्योर को दिया था!

गत साठ वर्षों में सरकार ने भाषा-सम्बन्धी जो आज्ञाएँ निकाली हैं, उन्हेंपढ़कर और जहाँ तक उनका आज तक पालन हुआ है, उस पर विचार कर यही सिद्धान्त निकला है कि जबतक कचहरियों में देशी भाषा की कार्रवाई फारसी अक्षरों मेंलिखी जायगी तबतक यह सम्भव नहीं है कि हिन्दुस्तानी भाषा में से अरबी और फारसीके शब्द छाँट दिए जायँ और ऐसी ही सरल भाषा का प्रचार हो जिसके लियेसरकार गत साठ वर्षों में बार-बार अपना मत प्रगट करती रही है |

यह मानाजा सकता है कि जैसी आज्ञाएँ सरकार ने आज तक निकाली हैंउनसे भी तीव्रतर आज्ञा निकालकर कचहरियों की भाषा सरल की जा सकती है, पर उसकी इच्छा की पूर्त्ति तबतक पूर्ण रीति से नहीं हो सकती है और न होना सम्भव ही है, जबतक किहिन्दुस्तानी भाषा हिन्दुस्तानी (नागरी) अक्षर मेंन लिखी जाय। कोर्ट ऑफडाईरेक्टर्स ने यह आज्ञा दी थी कि न्यायालयों की समस्त कार्रवाई स्थानीय देशा भाषा में हो, और जब श्रीमान् गवर्नर जनरल ने कहा था कि माल और न्याय-सम्बन्धी सब कार्रवाई उसी भाषा में हो जिसे सर्वसाधारण समझ सकें, तथा जब उन्होंने फारसी के स्थान पर देशभाषा के प्रचार की आज्ञा दी थी,तब उनका यही आशय था कि देशी भाषा का प्रचार देशी अक्षरो में ही हो, विदेशी अक्षरों में नहीं। जब कभी हम किसी भाषा के विषय में कुछ कहते हैं तब हमें उस भाषा की लिपि का भी विचार स्वभावत:आ जाता है, जबतक कि कोई बात स्पष्ट उसके विरूद्ध न बताई जाय या कही जाय |सरकार ने जब देशभाषा के प्रचार की आज्ञा दी थी तो उस आज्ञा का स्पष्ट उद्देश्य यही था कि कचहरियों कीकार्रवाई ऐसी भाषा और ऐसे अक्षरों में हो जिसे सर्वसाधारण भलीभाँति समझ और पढ़ सकें और यह उद्देश्य तबतक सफल नहीं हो सकता जबतक देश-भाषा का प्रचार विदेशी अक्षरों में होता रहेगा।

प्रारम्भ में यह लिखा जा चुका है कि सन् १८३०और १८३७ के बीच में इस बात पर बड़ाविचार तथा विवाद चला था कि फारसी के स्थान पर किस भाषा काप्रयोग हो? उस समय कुछ लोगों की यह सम्मति थी कि प्रयोग तो देश-भाषा का ही हो परन्तु लिपि रोमन हो। पर सरकार ने इस सम्मति को स्वीकार नहीं किया इससे यह स्पष्ट प्रगट होता है कि सरकार की यही इच्छा थी कि देश-भाषा का प्रयोग देशी अक्षरों में ही हो। फिर सन् १८९२ ई० में भी यहाँरोमन लिपि का झगडा उठा था और उस समय श्रीमान् लेफ्टिनेण्ट गवर्नर ने इस पर विचार करने के लिये एक छोटी सी समिति बना दी थी, पर उस समिति की रोमन के क्रमश: प्रचार करने सम्मति सरकार को स्वीकृत न हुई और श्रीमान् सर एण्टोनी मैकडोनेल ने उस प्रस्ताव को यह विचार करके अस्वीकृत कर दिया कि रोमन के प्रचार होने से सरकारी देश-भाषा की ओर से उदासीन हो जायेंगे|

भारतवासियों को अपनी भाषा विदेशी अक्षरों में लिखने को कहना वैसा ही है जैसा कि अंग्रेंजों से अपनी भाषा को नागरी अक्षरों में लिखने के लिये कहना |एक शताब्दी तक उद्योग करते रहने पर भी रोमन लिपि को सफलता प्राप्त न हुई और यह यह आशा कदापि नहीं की जा सकती कि प्रारम्भिक शिक्षा की उन्नति के साथ कभी वह अवसर भी आवेगा जब रोमन लिपि का किसी प्रान्त में प्रचार हो| पर यह समझ में नहीं आता कि जब सरकार ने रोमन अक्षरोंको अस्वीकार किया तो वह अबतक क्यों फारसी अक्षरों को यथास्थित छोड़े हुई है|जो दोष रोमन अक्षरों पर लगाए जाते हैं वे ही दोष फारसी अक्षरों पर भी लगाए जा सकते हैं। यह तो स्पष्ट ही है कि ये अक्षरविदेशी हैं और यद्यपि मुसलमानी राज्य के प्रारम्भ से ही इसका अदालतोंमें प्रचार होतारहा है, पर अबतक शिक्षित मुसलमानों और जीविका के लिये फारसी सीखे हुएहिन्दुओं को छोड़कर और कोई भी इन्हें नहीं सीखता। जनसाधारण तो इन्हें नाममात्र कोभी नहीं जानते। वे अपना सब काम नागरी, कैथी या महाजनी अक्षरों की सहायता सेचलाते हैं। फारसी अक्षरों के प्रचार से यही फल हो रहा है कि जिन लोगों का सर्वस्वअदालतों की कार्रवाइयों पर निर्भर रहता है, वे तबतक उनका एक अक्षर भी नहींसमझपाते जबतक कि वे अत्यन्त कष्ट उठाकर उन्हें किसी मुहर्रिर या मुख्तार से न पढ़वा लें।दर्ख्वास्तेंऔर अर्जीदावे आदि सब फारसी अक्षरों मेंलिखे जाते हैं, परन्तु जो लोग उनपर हस्ताक्षर करते हैं और जिनकी ओर से कचहरी में वे अर्जियाँ दी जाती हैं, वे उनपर हस्ताक्षर तो करते हैं पर उनका एक अक्षर भी नहीं समझ पाते! गाँव के लोगों को बहुधा इससे अवर्णनीय कष्ट उठाना पड़ता है। सरकार कीसदा से यह इच्छा रहती हैकि प्रजा के लिये सुखकर नियम बनाए जायँ और वैसे ही प्रबन्ध हों, तथा इसी इच्छाके अनुसार उसके सम्पूर्ण कार्य होते भी हैं; परन्तु यह समझ में नहीं आता कि ऐसीन्यायप्रिय सरकार उपर्युक्त बातोंको जानकर भी प्रजा के कष्ट को क्यों नहीं दूरकरती? इस बात को सरकार भी स्वीकार करती है कि नागरी अक्षरोंके प्रचार से ये असुविधाएँदूर हो जायँगी, क्योंकि अवध में बेदखली आदि की सूचनाएँ हिन्दी और उर्दू दोनों मेंनिकलती हैं। बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने भी गत वर्ष यह आज्ञा दे दी है कि सम्मन आदि हिन्दीऔर उर्दू दोनोंमेंलिखे जाया करें। बस इन काराजोंको छोड़कर पश्चिमोत्तर प्रदेश में(गढ़वाल और कुमाऊँ जिलों को छोड़कर) कहीं भी हिन्दी का प्रचार नहीं है।

फारसी अक्षरोंके विरोध मेंकेवल यही नहीं है कि वे विदेशी हैं तथाभारतवासी उन्हेंनहीं जानते, बल्कि ये अक्षर नितान्त अवैज्ञानिक, अपूर्ण और अत्यन्त भ्रामक हैं। साधारणत: जिस प्रकार से ये अक्षर लिखे जाते हैं और विशेषकर अदालतोंमें जिस प्रकार की लिखावट होती है उससे लोक का बड़ा अनिष्ट होता है। इन अक्षरों में बड़ा भारी दोषतो यह है कि एक बार जो लिखा गया उसका ठीक वैसा ही पढ़ाजाना कठिन तो है ही साथ ही कभी-कभी तोअसम्भव ही हो जाता है।

इन कारणों से अदालतों मेंसर्वथा इनका प्रचार अयुक्त है। शिकस्त: फारसीसे जो अनिष्ट होता है वह छिपा नहीं है। अनेक बार उसके विषय में लिखापढ़ी हो चुकीहै | प्रोफ़ेसर मोनियर विलियम्स ने ३० दिसम्बर सन्१८५७ ई. के ‘टाइम्स’नामक पत्रमें फारसी अक्षरों के दोष पूर्ण रूप से दिखाए हैं। उनका कथन है कि "इन अक्षरोंको सुगमता से पढ़ने के लिये वर्षो का अभ्यास आवश्यक है । वे कहते हैं कि इन अक्षरों में चार “ज” के रूप होते हैं तथा प्रत्येक अक्षरके प्रारम्भिक, मध्यस्थ, अन्तिम या भिन्न होने के कारण चार भिन्न-भिन्नरूप होते हैं। अन्त में प्रोफेसर साहब कहते हैंकि चाहे ये अक्षर देखने में कितने ही भले क्यों न लगता हों, पर न तो ये कभी पढ़े जाने योग्य हैं और न छपने के ही योग्य हैं, तथा भारत में विद्या और सभ्यता के विकास में सहायता होने के तों सर्वथा अनुपयुक्त हैं। डॉक्टर राजेन्द्रलाल, प्रोफेसर डॉसन और श्री ब्लैकमैन तथा राजा शिवप्रसाद आदि बड़े-बड़े विद्वानों ने दृढ़तापूर्वक प्रोफेसर मोनियर विलियम्स केमत का समर्थन किया है। भारतेन्दु बाबूहरिश्चन्द्र लिखते हैं कि जिनफारसी अक्षरोंऔर विशेषकर शिकस्त: में अदालतों का काम चलता है वे मुख्तारों,वकीलों और धूर्तो के लिये आय का एक अच्छा मार्ग है। एक ही चिह्न ऐसा बनाओ और यह मान लो कि वह किसी ग्राम का नाम है। यदि हम पहले अक्षर को 'वे'मानलेंतो उसका उच्चारण ११ प्रकार से होगा। जैसे बबर, बपर, बतर, बटर, बसर, बनर,बहर, बयर, बेर, बैर, बीर | फिर यदि हम पहले अक्षर को 'पे', 'सीन', 'ते', 'हे', नून, हे, 'वाव', 'ये" मानेंतो उस शब्द का उच्चारण ७७ प्रकार से हो सकता है। यदि हमउपर्युक्त शब्दों में से प्रथम आठ शब्दों के स्वर को बदल दें तो ६० शब्द और बन जायेंगे। जैसे बुनर, बिनर, हुनर, सिपर आदि। फिर यदि हम अन्तिम अक्षर को 'बे' या ‘रे’मानें तो ३०४ शब्द बन जाते हैं, और यदि हम यह जान लें कि अन्तिम अक्षर में “दाल” है तो पुरे १५२ शब्द और बन जाते हैं। इस प्रकार से यह स्पष्ट है कि एक शब्दजो तीन अक्षरों का है तथा जिसके अक्षर के तीन ही भिन्न रूप हो सकते हैं वह ६०६प्रकार से पढ़ा जायगा। यदि हम इसी शब्द के अन्तिम अक्षर को ‘बे’ में बदल दें तो हम एक हजार और नये शब्द बना सकेंगे। बलिहारी है ऐसे अक्षरों की। इस विषय में‘पायोनियर’ पत्र का यह मत है कि आवश्यक कागजात लिखने के लिये तो इनसे बुरे अक्षरों की मन में कल्पना भी नहीं की जा सकती।

इस बात के कहने को अब कोई आवश्यकता बाकी नहीं रह गई कि इनअक्षरों में अदल-बदल होना कोई कठिन नहीं है, क्योंकि एक बिन्दी के देने मात्र सेही कुछ-का-कुछ हो जाता है। रहा उन अक्षरों का पढ़ना। कलेक्टर, जज और वकीलों को तो छोड़ दीजिए-वे मुहर्रिर भी, जिन्हेंरात-दिन अदालती कागजों के पढ़ने के अतिरिक्त और कुछ काम ही नहीं रहता, बेचारे पहरों एक-एक शब्द पर रुके रह जाते हैं और उसे पढ़ ही नहीं पाते।

हिन्दुओं की तो बात ही छोडिए, बी.ए. तक अरबी-फारसी पढ़ने वालेमुसलमान भी वकालत की परीक्षा में साधारण अदालती लिखावट नहीं पढ़ सकते। अभी थोड़े ही दिन हुए कि इलाहाबाद हाइकोर्ट में एक बड़ा भारी मुकदमा पेश हुआथा। उसमेंएक मनुष्य का नाम ऐसा लिखा था जो झिंगुरी राय तथा चिखुरी राय दोनों तरह से पढ़ा जा सकता था। बहुत दिनोंतक छान-बीन करने पर भी यह मुकदमा तय नहीं हुआ और अन्त में प्रिवी कौन्सिल तक गया। वहाँ यह निर्णय हुआ कि झिंगुरी राय तथा चिखुरी राय दोनों एक ही पुरुष के नाम थे। नरही ताल्लुकों के २९ मुक़दमे हाइकोर्ट में पेश हैं, जिनका फैसला गाजीपुर के सब जज ने दो वर्ष हुए,किया था|इन मुकदमों का फैसला नामों के ठीक-ठीक पढ़े जाने पर निर्भर है | एक मुक़दमे में एक नाम कागजों पर कई जगह लिखा मिला जो कहींसहज कुँवर,कहीं सजन कुँअर और कहीं सजह कुँअर तथा कहीं बात कुँअर पढ़ा गया | इसी मुकदमे में उदितनारायण का नाम उदयनारायणतथा वैजनाथ का नाम जपनाथ पढ़ा गया|पुन: हरदयाल राय केमुकदमे में भी यही गड़बडी हुई। इन मुकदमों का पूरा आनन्द उस समय आवेगा जबइनकी सुनवाई हाइकोर्ट में प्रारम्भ होगी। ये दो-तीन दृष्टान्त साधारण रीति के यहाँ दिएगए हैं। न जाने ऐसे कितने मुकदमे प्रतिदिन हुआ करते हैं। यह कहना तो कदाचित् ठीकहो कि अदालत इन नामों को जैसा पढ़ती है वह ठीक है पर यदि यह मान भी लियाजाय तो यह समझ में नहीं आता कि वादी, जज आदि सब लोग अक्षरों के लिये हीइतना कष्ट क्योंउठावें? इससे तो अदालत के समय का तथा गरीब प्रजा के धन काव्यर्थ अपव्यय होता है।

प्रथम तो नागरी अक्षर निर्दोष हैं। फिर भी यदि नागरी अक्षरों में भी उतनी हीत्रुटियाँ होतीं जितनी फारसी में हैंतो भी नागरी अक्षरों का ही प्रचार होना इसलियेआवश्यक था कि उन अक्षरोंको प्रजा भली भाँति जानती है।

श्री बडेन् महोदय के कथनानुसार तो नागरी अक्षरों का कोई कितना ही बड़ाविरोधी हो और घोर शत्रु ही क्यों न हो, वह यह नहीं कह सकता कि इनमें किसी प्रकारकी त्रुटि है। इन अक्षरोंकी मनोहरता, सुंन्दरता, स्पष्टता, पूर्णता, और शुद्धता की विद्धानोंने केवल प्रशंसा ही नहींकी है बल्कि उसी के आधार पर रोमन में अन्य भाषाओं केशब्दों के लिखने के लिये नियम और चिह्न बनाए गए हैं। प्रोफेसर मोनियर विलियम्सकहते हैंकि स्थूल रूप से यह कहा जा सकता है कि देवनागरी अक्षरों से बढ़कर पूर्ण और उत्तम अक्षर दूसरे नहीं हैं”। प्रोफेसर साहब ने तो इनको देवनिर्मित तक कह दियाहैं|

किन्तु उपर्युक्त प्रोफेसर महोदय के ध्यान में नागरी अक्षर इतने अधिकसर्वांगपूर्ण हैं कि उनसे प्रतिदिन का कार्य नहीं चल सकता। उसके उत्तर में यह कहाजा सकता है कि भारतवर्ष के कई स्थानों में बहुत काल से नागरी अक्षरों का प्रचार हैऔर आज तक वहाँ कार्य करने में किसी प्रकार की भी कठिनता नहीं हुई। फिर यहकहा जा सकता है कि नागरी अक्षरों में रोमन के 'जेड्' और 'एफ्' और अरबी तथाफारसी के 'फे', 'काफ़', 'गैन' और 'जाल' अक्षरों के लिये कोई चिह्न नहीं हैं। इसकेउत्तर में रेवरेण्ड बेट्स कहते हैं कि नागरी अक्षरो के नीचे एक बिन्दी देने से अरबीतथा फारसी अक्षरों का उच्चारण ठीक-ठीक हो सकता है, और उन्हेंकोई भी साधारण शिक्षा-प्राप्त पुरुष सुगमता से समझ सकता है।

सर आइजेकृ पिटमैन ने कहा है कि संसार में यदि कोई सर्वांगपूर्ण अक्षरहैं तो नागरी के हैं| बम्बई सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सर अर्सकिन पेरी ने 'नोट्सटु ओरिएण्टल केसेज’की भूमिका में लिखा है कि एक लिखित लिपि की सर्वान्गपूर्णता इसी से जान पड़ती है कि प्रत्येक शब्द का उच्चारण उसके देखने से ही ज्ञात हो जायऔर यह गुण भारतवर्ष के अन्य अक्षरों की अपेक्षा देवनागरी अक्षरों में अधिक पायाजाता है, जिसमें संस्कृत लिखी जाती है। उस गुण से लाभ यह है कि हिन्दूबालकों ने जहाँ अक्षर पहचान लिए कि वे सुगमता से तथा बिना रुकावट के पढ़ने लग जाते हैं।इस कारण जिस भाषा का पढ़ना सीखने में यूरोप में जहाँ बहुधा कई वर्ष लग जाते हैं वह भारतवर्ष में बहुधा तीन मास में ही आ जाती है।" ‘पायनियर’पत्र ने भी १० जुलाई सन् १८३७ ई. के अंक में लिखा है कि नागरी अक्षर मन्द गति से लिखे जाते हैं, परन्तुजब एक बार लिख जाते हैं तो वे छपे हुए के समान हो जाते हैं, यहाँ तक कि उनमेंलिखे हुए शब्द को उसका अर्थ न जानने वाला व्यक्ति भी शुद्धतापूर्वक पढ़ लेगा|”

सरकार ने सदा अनेक प्रकार से प्रजा को सुखी करने की चेष्टा की है तथा उसकी सदा यह इच्छा रही है कि लोग सुगमता से कचहरियों की कार्रवाईयों को समझ सकें| ऐसा होने पर भी यह विचारकर दु:ख होता है कि हजारों वर्षो से प्रचारित नागरी जैसे उत्तम और पूर्ण अक्षरों का निरादर करके यहाँ की कचहरियों में बहु-दोष-पूर्णतथा अत्यन्त भ्रामक फारसी अक्षरों का सरकार ने प्रचार कर रक्खा है। यहाँ यह बात ध्यान में लाने की आवश्यकता है कि बारह सौ वर्ष तक फारसी अक्षरों के सम्मान औऱनागरी अक्षरों के तिरस्कार होने पर भी नागरी अक्षरों पर से यहाँ की प्रजा का अविकलप्रेम जरा सा भी नहीं घटा है, बल्कि आजतक उसी में अथवा महाजनी, कैथी आदिउसके अन्य रूपों में सर्वसाधारण का सब काम चलता है। यह कहा जा चुका है कि बोर्ड ऑफ रेवेन्यूने अपने ८ मई सन् १८५७ के आज्ञापत्र में यह लिखा था कि यहाँकी साधारण प्रजा काश्तकार और जमीन्दारों में नागरी अक्षरों का प्रचार है और इसी आधार पर यह आज्ञा दी थी कि पटवारियों के कागजात उन्हीं अक्षरों मेंलिखे जायँ।इस कथन के साथ-ही-साथ यहाँ एक बात और कह देनी आवश्यक है कि टॉम्सनमहोदय के समय में इन प्रान्तों में प्रारम्भिक शिक्षा का प्रादुर्भाव हुआ और उसी समयकुछ स्कूलीय पुस्तकें हिन्दी और उर्दूमें छापी गईं।

सन् १८५०-५१ में १४३३१ पुस्तकें बिकीं, जिनमें से ९०८७ हिन्दी की, १३०७ उर्दू की औऱ ९३७ उर्दू-हिन्दी की थी। शिक्षा-विभाग के सन् १८६३-६४ के विवरण के इकसठवें पृष्ट में लिखा है कि इस वर्ष ३०५७४८ पुस्तकें छपीं और खरीदी गईं। इनमें से ५०२६० उर्दू की, २०९९८० (जिनमें २००० नक्शे थे)हिन्दी की,१०००० फारसी की,और १९८०८ अंग्रेजी की थीं, तथा ९००० हिन्दी-उर्दू के नक्शेथे। इसी प्रकार नॉर्थ इण्डिया बाइबिल ऐण्ड ट्रैक्ट सोसाइटी के विवरण में हिन्दी ग्रन्थों की अधिकता प्रतिवर्ष देख पड़ती है। श्री ग्राउस महोदय ने एजुकेशनल कमीशन को सन्१८८२ ई. में लिखा था कि बुलन्दशहर जैसे मुसलमानी जिले में म्युनिसिपल कमेटियों के आधे से अधिक सभासद इस देश के अक्षरों (नागरी) को ही पढ़ सकते हैं |तहसीली कमेटियों में तो इनकी संख्या इससे भी अधिक होगी। सन् १८९१ की मनुष्य-गणना लिखने के लिये जितने लोग नियुक्त किए गए थे उनमें से ८०११८ने हिन्दी में,४०१९७ ने कैथी में (जो हिन्दी का एक रूपान्तर है) लिखा, अर्थात् सब मिलाकर १२०३१५ लोगों ने हिन्दी में और ५४२४४ ने फारसी में लिखा | जिस समय गाँवोंमें स्कूल खोले गए, उस समय हिन्दी पढ़नेवालों की संख्या उर्दू पढ़नेवालों से छ:गुनी थी और पचास वर्ष तक उर्दूका आदर और हिन्दी का निरादर रहने पर भी ३१ मार्च सन्१८९६ को १०५४४६ बालक हिन्दी और ५२६६९ बालक उर्दूपढ़तेथे।

इन प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि हर तरह से हतोत्साह हाने पर भी इन प्रान्तों में फारसी अक्षरों से कहीं अधिक नागरी अक्षरों का प्रचार है और वे अधिकप्रयोजनीय हैं। फारसी अक्षरों का जो कुछ प्रचार है वह केवल इसीलिये है कि अदालतों का काम उन्हीं अक्षरों द्वारा होता है | आज यदि नागरी अक्षरों का प्रचार फारसी अक्षरों के स्थान पर हो जाय तो कल ही फारसी य उर्दू पढ़ने वालों की संख्या घट जायेगी|३१ मार्च सन् १८९६ ई. को वर्नैक्यूलर प्राइमरी स्कूलों में १३५४९७ हिन्दू और २१५१० मुसलमान बालक शिक्षा पाते थे। उनमें से ५२६६९उर्दू पढ़ते थे |

अब यदि यह मान भी लिया जाय कि प्रत्येक मुसलमान उर्दूपढ़ता है (यद्यपि वास्तव में यह बात नहीं है) तो ३१००० हिन्दू बालकों को बाल्यावस्था से ही उर्दू सीखनी पड़ती है, जिसके सीखने मेंउन्हें हिन्दी सीखने के बनिस्बत अधिक समय लगता और विशेष कठिनता होती है। इस प्रकार उर्दू सीखने का मुख्य कारण यही हैकि जीविका-निर्वाह के लिये वह अत्यन्त आवश्यक है। यह दृढ़तापूर्वक कहा जा सकता है कि यदि अदालतों में नागरी अक्षरोंका प्रचार हो जाय तो केवल हिन्दूही नहीं बल्कि मुसलमान भी उर्दू सीखना छोड़कर गुणागरी नागरी सीखने में अपना समयऔर द्रव्य लगावेंगे। इससे यह स्पष्ट है कि न्याय, उपयुक्ता और आवश्यकता पर ध्यानदेकर अब नागरी अक्षरों के प्रचार की आज्ञा देने में कोई बाधा न होनी चाहिए। कुछलोगों का यह कहना है कि नागरी अक्षरोंमें उतनी शीघ्रता से कार्य नहीं हो सकताजितना फारसी में। प्रथम तो इस बात में सन्देह है कि वास्तव में इन प्रान्तों कीकचहरियों और दफ्तरों मे मुहर्रिर लोग उससे अधिक शीघ्रता से काम कर सकतेहैं जितनी शीघ्रता से कुमाऊँ, बिहार, मध्यप्रदेश आदि स्थानों में हिन्दी में होता है। यदि यहमान भी लिया जाय कि फारसी में अधिक शीघ्रता से काम चलता है तो भी यह बातऐसीनहींहै जिससे नागरी के गुणों तथा स्वत्तवोंमेंकोई कमी आवे । शिकस्त: लिखनेमें यदि अदालत का कुछ थोड़ा सा समय बच जाता है तो इस बात पर भी ध्यान देनाचाहिए कि उन्हीं कागजों के पढ़ने में कितना समय नष्ट होता है और अन्त में नामों आदिके विषयमें जो सन्देह बाकी रह जाता है वह घलुए में है। नागरी अक्षरों में लिखने सेयदि समय कुछ अधिक लग जाता है तो पुन: उसके पढ़ने में न कोई कष्ट होता है औरन कुछ सन्देह बाकी रह जाता है। सर्वसाधारण का बहुमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करनाकदापि उचित नहीं है।

 सर्वसाधारण के समय के अन्तर्गत केवल क्लर्कों तथा साक्षी आदि लिखनेवाले अफसरों का समय ही नहीं समझना चाहिए; बल्कि नकल करने वालों, अनुवाद करने वालों और उन अदालतों का समय भी उसमें सम्मिलित है जिन्हेंकागजों को अन्त में पढनाया पढ़वाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त न्याय और प्रजा के सुभीते पर भी ध्यान रखना उचित है | कागजों और पत्रों के शुद्ध और स्पष्ट लिखे जाने के गुण टाइपराइटरों के अधिक प्रचार से इतने अधिक स्पष्ट हो रहे हैं कि अब इस बात के कहने की कोई आवश्यकता नहीं है कि नारारी अक्षरों के प्रचार में केवल इन्हीं कारणों से बाधा न होनीचाहिए कि ये शिकस्त: के बराबर शीघ्र नहीं लिखे जा सकते। रीवाँ, बिहार, मध्यप्रदेश और कुमाऊँ आदि स्थानों में नागरी अक्षरों के प्रचार से यह बात अब स्वत:सिद्ध हो गईहै कि ये अदालतों को आवश्यकता के अनुकूल उतनी शीघ्रता और सुगमता से लिखेजा सकते हैं। यदि फारसी अक्षर नागरी की अपेक्षा अधिक सुगमता से लिखे जा सकतेहैं तो वे नागरी के रूपान्तर गुजराती, बंगाली, मराठी और कैथी आदि से भी शीघ्र लिखेजा सकते हैं। परन्तु सरकार ने प्रजा के सुभीते और न्याय पर ध्यान न देकर इन्हीं अक्षरोंका प्रचार कर रक्खा है। इसलिये यह आवश्यक है कि पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध कीकचहरियों और वहाँ के दफ्तरों में फारसी के स्थान पर नागरी अक्षरों का प्रचार कियाजाय|

और भी कई कारण ऐसे हैं जिनसे इन प्रान्तवालों की भाषा को और उनकेअक्षरों को दफ्तरों और कचहरियों में उनके योग्य स्थान मिलना चाहिए। इनमें से मुख्य कारण प्रारम्भिक शिक्षा और प्रजा की उन्नति है। सन् १८५४ ई. के शिक्षा विषयकआज्ञापत्र में कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स ने लिखा था कि कई आवश्यक विषयों में से शिक्षाके विषयोंपर हम लोगों से बन पड़े (तो) भारतवासियों को वे भौतिक और नीतियुक्तपुरस्कार देंजो विद्या के प्रचार से मिलते हैं और जिन्हें भारतवर्ष ईश्वर की दया से इंग्लैण्डके साथ अपने सम्बन्ध के कारण प्राप्त करे।" इसके उपरान्त सरकार का कार्य औरउसका कर्त्तव्य दिखलाकर कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स ने लिखा कि हम लोगों को अब एकदूसरे विषय पर ध्यान देना आवश्यक है, जिस पर हमने आज तक कुछ भी ध्यान नहींदिया। अर्थात् वह कौन सी रीति है जिससे हम लोग भारतवर्ष की इस प्रजा को, जो स्वत:किसी प्रकार की शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकी या कर सकती, ऐसी आवश्यक और अर्थकारीशिक्षा दे सकें जो सब वर्ग की प्रजा के उपयुक्त हो? हम लोगों कीयह इच्छा है किसरकार विशेषत: भविष्य में इस उद्देश्य की सफलता के लिये प्रयत्नशील हो और हमलोग इसके लिये विशेष धन व्यय करने की आज्ञा देने को उद्यत हैं।"

इसके २८ वर्ष उपरान्त भारत सरकार ने ‘एड्युकेशन कमीशन’नियुक्त करतेसमय लिखा था कि श्रीमान् गवर्नर-जनरल की यह इच्छा है कि कमीशन कोइस बातका ध्यान रखना चाहिए कि सरकार प्रारम्भिक शिक्षा के विषय को कितना अधिकमहत्त्वपूर्ण समझती है। अतएव कमीशन की जाँच का मुख्य उद्देश्य यह होना चाहिए किभारतवर्ष भर में प्रारम्भिक शिक्षा की क्या अवस्था है और उसकी उन्नति तथा उसकेप्रचार के लिये क्या-क्या उपाय करने चाहिए?"  जाँच और विचार करने पर एड्युकेशनकमीशन ने एक मत होकर यह सम्मति दी कि "सरकार को प्रारम्भिक शिक्षा पर हीविशेष ध्यान देना चाहिए और उसके लिये वह सब धन व्यय होना उचित है, जो शिक्षाके लिये स्थानीय कोष (लोकल फण्ड) के निमित्त अलग कर दिया गया है। प्रान्तों की आय से भी इसके लिये अधिक धन लेना चाहिए।" यह सम्मति गवर्नर-जनरल और भारत-सचिव दोनों ने स्वीकार की और तब से श्रीमान् वाइसराय प्रारम्भिक शिक्षा की उन्नति पर हर्ष के साथ यह आशा करते हैं कि प्रान्तीय सरकारों का उद्योग इसओरप्रतिदिन बढ़ता जाय | श्रीमान् सर एण्टोनी मेकडौनल ने भी प्रारम्भिक शिक्षा पर पूराजोर दिया है तथा वे इसकी उन्नति को अपने शासनकाल का मुख्य कर्त्तव्य मानते हैं।अतएव अब प्रारम्भिक शिक्षा की आवश्यकता और उसके सम्बन्ध मेंसरकार की इच्छाके विषय में कोई सन्देह नहीं रह गया और न इसी बात में कोई सन्देह है कि इस शिक्षाका सफलतापूर्वक प्रचार देश-भाषा के द्वारा ही हो सकता है। श्री फ्रेड्रिक जॉन शोर नेलिखा है कि "भारतवासियों में से अधिकांश लोगों को उनकी देश-भाषा द्वारा शिक्षित बनाना चाहिए तथा उसी के द्वारा वे शिक्षित बनाए भी जा सकते हैं।"

विद्धान् मैकॉले ने भी यही बात कही है कि जब केवल प्रारम्भिक शिक्षा हीउद्देश्य हो तो देशवासियों की ही भाषा द्वारा सिखाना सबसे सुगम है। कोर्ट ऑफडाहरेक्टर्स ने सन् १८५४ के आज्ञापत्र में लिखा है कि हमलोगों का न तो यह उद्देश्यही है और न इच्छा ही है कि देशभाषा के स्थान पर अंग्रेजी पढ़ाई जाय | हम लोगों नेसदा उन भाषाओं के प्रचार की आज्ञा पर उचित ध्यान दिया हैं जिन्हेंदेशवासियों कासमूह जानता हो। हम लोगों ने अंग्रेजी की उपेक्षा कर इन्हीं भाषाओंकी कचहरियों मेंतथा सरकारी अफसरों और प्रजा के परस्पर व्यवहार में फारसी के स्थान पर प्रचलितकिया है। यह अनिवार्य है कि शिक्षा प्रणाली में इन देशी भाषाओं की शिक्षा परदृढ़तापूर्वक ध्यान दिया जाय और इन्हीं के द्वारा उन आवश्यक उन्नत विद्याओं काभारतवासियों मेंप्रचार हो जिन्हेंवे विदेशी भाषा की कठिनाइयों या अपनी दुरवस्था केकारण न सीख सकते हों। शिक्षा देने के लिये अंग्रेजी उन्हीं स्थानों मेंपढ़ाई जानी चाहिएजहाँ उसकी चाह हो। परन्तु अंग्रेजी के साथ-साथ उस जिले की देशी भाषा का तथाउस भाषा मेंजिन विषयोंकी शिक्षा हो सकती हो उन अन्य बातों को सिखाने पर भीध्यान रहे। जिन्होंने अंग्रेजी द्वारा विद्याध्ययन करने की योग्यता प्राप्त कर ली है उन्हें उसीके द्वारा शिक्षा दी जाय, पर जो लोग अंग्रेजी न जानते हों, उन लोगोंकी शिक्षा देश-भाषा द्वारा ही हो।" इस मत का अनुमोदन भारत-सचिव ने सन् १८५९ ई. में कियातथा एड्युकेशन कमीशन ने जाँच और विचार के उपरान्त यह निश्चय किया किप्रारम्भिक शिक्षा वह है जो देशभाषा द्वारा जनसाधारण के उपयोगी विषयों में दी जायऔर जो यूनिवर्सिटी-शिक्षा के आरम्भिक रूप न समझी जाती हो।" इस परिभाषा कोसरकार ने स्वीकार किया और तभी से इसे निश्चित समझना चाहिए। इस लेखके आरम्भमें यह बात सिद्ध की जा चुकी है कि इस प्रान्त की भाषा हिन्दी है। फारसी तथा अरबीशब्दों की भाषा हिन्दी है। फारसी तथा अरबी शब्दों की अधिकता होने से तथा उसकेविदेशी अक्षरों में लिखे जाने के कारण शिक्षित मुसलमानों और राज्य-कर्मचारियों कोछोड़कर जनसाधारण में उर्दूकभी प्रचलित न हुई। इसी कारण से इसके द्वारा प्रारम्भिकशिक्षा का प्रचार यथेष्ट नहीं हो सकता। पश्चिमोत्तर प्रदेश की सरकार ने इस बात को प्रारम्भ में समझकर यह आज्ञा दी थी कि स्कूलों में हिन्दी पढाई जाय, परन्तु जब उर्दू का प्रचार अदालतों में किया गया तोयह आवश्यक समझा गया कि उसके अध्ययन में लोग उत्साहित किए जायं। इसी उद्देश्य से सरकार ने सन्१८४४ ई. में इसबात पर जोर दिया कि उर्दूके पढ़नेवाले उत्साहित किए जायँ। परन्तु किसी प्रकार के उत्साह की आवश्यकता न थी। अदालतों में उर्दूका प्रचार ही उसकी उन्नति का प्रधान साधन हुआ|  इससे हिन्दी को अधिक हानि पहुँची, यद्यपि हिन्दी के द्वारा ही केवल प्रारम्भिकशिक्षा उत्तम रीति से दी जा सकती है। उर्दू पढ़ने वालों को सऱकारी नौकरी की आशा थी, पर बेचारे हिन्दी पढ़नेवालों का भविष्य बिलकुल अन्धकारमय था।

जिन्हेंसरकारी नौकरी की इच्छा थी या जो वकालत करना चाहते थे उन्होंने उर्दू पढ़ना आरम्भ किया। परन्तु जिन्हेंकिसी बात की आवश्यकता नथी और जो सरकारी नौकरी के लिये भी लालायित न थे एक कठिन विदेशी भाषा के सीख़नेमें न तो कोई लाभ ही समझा और न यही चाहा कि अपनी मातृभाषा हिन्दी के सीखनेके लिये वे स्कूलों के नियमोंसे बद्ध हों। क्योंकि प्रथम तो उर्दू पढ़ने वाले लोग उन्हेंअनादर की दृष्टि से देखने लगे और फिर इसके पढ़ने में किसी प्रकार का उत्साह तोकहींसे मिलता ही न था। बस हिन्दी की उन्नति तथा उसके प्रचार का अन्त तो इसप्रकार से हो गया। जिन्हें किसी प्रकार से नागरी जानना आवश्यक हुआ उन्होंने उसे घरपर या पाठशालाओं मेंपढ़ लिया। इसलिये जनसाधारण में हिन्दी के प्रचार का कोई विशेष प्रयोजनीय कारण न रहा। इस प्रकार से जहाँ किसी समय बड़े-बड़े पण्डित औरसभ्य आर्य लोग बसते थे, आज़ उसी पश्चिमोत्तर-प्रदेशको सब प्रान्तों से अधिक जड़और अशिक्षित बनने का दिन नसीब हुआ।

सन् १८४३ ई. में इस प्रान्त के शिक्षा-विभाग का प्रबन्ध सरकार ने प्रान्तीयसरकार के हवाले किया। उस समय यहाँ के लेफ्टिनेण्ट गवर्नर श्री टॉम्सन थे। उन्होंनेदेशभाषा में प्रारम्भिक शिक्षा देना निश्चय किया और उसी उद्देश्य से प्रत्येक तहसील मेंएक-एक वर्नाक्यूलर स्कूल खोला गया। इसके थोड़े ही समय बाद हल्काबन्दी स्कूलखुले। निदान सरकार के उत्साह, प्रोत्साहन और सहयोग से देशी स्कूलों की संख्या बढ़ी और जमीन्दारों ने अपनी आय पर एक रुपया सैकड़ा शिक्षा के लिये देना स्वीकार किया। इस प्रबन्ध से प्रारम्भिक शिक्षा की उन्नति तथा उसके प्रचार की पूर्ण आशा और सम्भावना हुई तथा कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स ने अपने १८५४ ई. के आज्ञापत्र में श्रीयुत टॉम्सन के प्रबन्ध की बड़ी प्रशंसा की और अन्य प्रान्तीय सरकारों को उसका अनुकरण करने की सम्मति दी। उसके अनुसार सब प्रान्तों में आवश्यक परिवर्तन सहित प्रबन्ध भी हुआ। पश्चिमोत्तर प्रदेश को छोड़कर अन्य प्रान्तोंमें इस प्रारम्भिक शिक्षा के प्रबन्ध को पूर्ण सफ़लता मिली, परन्तु जहाँ इसका जन्म हुआ वहाँकी दशा अत्यन्त शोचनीय होती गई|इसका कारण यही है कि अन्य प्रान्तों में वहीं की भाषा में शिक्षा का प्रचार हुआ। परन्तु यहाँकी कचहरियों में मातृभाषा हिन्दी के बदले उर्दूका प्रचार किया गया जो प्रारम्भिक शिक्षा का मुख्य अवरोधक हुआ। सन् १८६३ ई. में एक महाशय ने “कलकत्ता रिव्यू” में उडीसा में देशभाषा की शिक्षा शीर्षक एक लेखलिखा था |उसके अनुसार सन् १८५३ ई. में पश्चिमोत्तर प्रदेश के उन आठ जिलों में केवल ३,४६९ स्कूल और ३६,८८४ विद्यार्थी थे, जहाँ प्रारम्भिक शिक्षा के प्रचार का पूर्ण उद्योग किया गया था और जहाँ ४२,७२०००मनुष्य बसते थे। सन् १८५४ ई. में उड़ीसा के कटक, पुरी तथा बालासोर जिलों में ३,०८५स्कूल और २७,००० विद्यार्थी थे, जहाँ के ( पुरूष) वासियों की संख्या कोई १,००,००००के लगभग होगी। पश्चिमोत्तर प्रदेश में राजा और प्रजा दोनों के उत्साह से जो सफ़लता नहीं हो सकी वह उड़ीसा में केवल प्रजा के ही उत्साह और उद्योग से प्राप्त हो गई। इसका कारण यही है कि उडीसा की कचहरियों मे वहाँ की मातृभाषा उड़िया का प्रचार है, परन्तुपश्चिमोत्तर प्रदेश में एक विदेशी भाषा और विदेशी अक्षरों में ही सब सरकारी काम होताहै। हसी कारणउड़ीसामें विद्याध्ययन की अधिकता और यहाँ उसी बात का अभाव हुआ।कचहरियों में उर्दू का प्रचार होने पर भी ३० सितम्बर सन् १८५४ ई.के आज्ञापत्र में‘बोर्डऑफ रेवेन्यू’ने यह उपदेश किया कि पटवारियों के कागजात हिन्दी भाषा और नागरीलिपि में लिखे जायँ।

इस पर लोगों को यह आशा हुई कि अब सरकार हिन्दी के स्वत्त्वों पर विचारकर उसका कचहरियों मेंप्रचार करेगी। इसलिये हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या उर्दू पढ़नेवालों से छ:गुनी हो गई थी, परन्तु यह अवस्था बहुत थोड़े काल तक रही। जब लोगोंने यह देखा कि कचहरी की भाषा में कोई परिवर्त्तन नहीं हुआ और न होने की आशाही है, उर्दूजानने वालों की पूछ है, और वे उच्चपद प्राप्त कर अपनी प्रत्येक प्रकार सेउन्नति कर रहे हैं और हिन्दी जानने वालों की कहीं कोई भी सुध नहीं लेता तो उन्हेंहारकर अपने मातृ-भाषा-प्रेम को तोड़ना पड़ा और उर्दू भाषा की ओर दत्तचित्त होनापड़ा। पर इस भाषा की कठिनता ने उनको कृतकार्य न होने दिया और अन्त मेंकेवलवे ही लोग शिक्षाकाँक्षी रह गए, जिनके पास जीविका निर्वाह के लिये नौकरी केअतिरिक्त और कोई अवलम्ब न था। इस प्रकार सरकार का जनसाधारण में विद्या फ़ैलाने का उद्योग निष्फल हुआ। इस कथन की पुष्टि निम्न्लिखित तालिका से होती है।

 पश्चिमोत्तर प्रदेश के प्राइमरी (हल्काबन्दी) स्कूलों में सन् १८६० से १८७४ ई. तक हिन्दी तथा उर्दूपढ़ने वालों की तुलनात्मक संख्या ।

वर्ष

पश्चिमोत्तर प्रदेश

(कुमाऊँ तथा गढ़वाल को छोड़कर)

कुमाऊँ और गढ़वाल

 

उर्दू या फारसी

हिन्दी

हिन्दी

१८६०-६१

१८६१-६२

१८६२-६३

१८६३-६४

१८६४-६५

१८६५-६६

१८६६-६७

१८६७-६८

१८६८-६९

१८६९-७०

१९७०-७१

१९७१-७२

१९७२-७३

१९७३-७४

११,४९०

१७,४३१

२०,०७३

२०,१८०

२१,६१८

२१,९८२

२४,०५८

२५,६५७

३२,३७७

३२,४४५

३४,६२१

४८,६६५

४३,६२९

४८,२२९

६९,१३४

७२,६४८

७३,७२६

७३,६२५

६०,६७३

७६,५१६

८०,९६१

७६,३००

७९,०२३

७४,३७२

७७,७७८

८८,१७९

७६,४७६

८५,८२०

 

....

....

१,१८७

१,५६७

२,१२७

१,३६३

१,४१२

१,५०२

१,३३६

१,०५५

३,१७३

४,१४५

५,१९८

६,७०८ 

 

     

ये सब आँकड़ेशिक्षा-विभाग के विवरण से लिए गए हैं। इसके पीछे के विवरण में हिन्दी और उर्दूपढ़ने वालोंकी संख्या अलग-अलग नहीं दी गई है, परन्तुयह पता लगा है कि ३१ मार्च सन् १८९२ ई. को ५०,३१६ बालक उर्दू और१,००,४०४ बालक हिन्दी पढ़ते थे। अब इन संख्याओं से यह सिद्ध होता है किप्रश्चिमोत्तर प्रदेश में (गढ़वाल और कुमाऊँ को छोड़कर) जहाँ कचहरियों में उर्दू भाषा का प्रचार है, सन् १८६२-६३ में उर्दू और हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या ९३,७९९ थीऔर बारह वर्ष उपरान्त सन् १८७३-७४ में यह संख्या केवल १,३४,०४९ हुई, अर्थात् दुनी से कुछ कम | गढ़वाल और कमाऊँ में, जहाँ की कचहरियों में हिन्दी भाषा का प्रचार है, सन् १८६२-६३ में पढ़ने वालों की संख्या १,१८७ थी, बारह वर्ष बाद६,७०८, अर्थात् छ:गुनी हो गई। इससे स्पष्ट हुआ कि बारह वर्ष में हिन्दी भाषा और नागरी अक्षरों के कारण पढ़ने वाले छ: गूने अधिक हो गए। इस बात का अनुभवसर्वप्रथम राजा शिवप्रसादजी ने किया था और उन्होंने अपने "कचहरी की लिपि परअभ्यर्थनापत्र" (मेमोरेण्डम ऑन कोर्ट कैरेक्टर) शीर्षक लेख में दु:ख प्रगट किया है।राजा शिवप्रसादजी ने प्रारम्भिक शिक्षा का प्रचार न होने का कारण कचहरियों मेंफारसी अक्षरों का प्रचार होना ही बतलाया था, तथा इस आपत्तिको दूर करने के लियेनागरी अक्षरों के प्रचार करने को सम्मति दी थी, पर किसी ने उस पर ध्यान न दिया।इसके कुछ काल उपरान्त सर विलियम म्योर की सेवा में एक अभ्यर्थना पत्र भेजा गयाजिसमें कचहरियों और दफ्तरों में नागरी अक्षरों के प्रचार के लिये प्रार्थना की गई थी।इस अभ्यर्थना पत्र में भी दिखाया गया था कि बिना नागरी अक्षरों के प्रचार के इस देश में विद्या नहीं फैल सकती। सन् १८७४ के जनवरी मास में सरकार ने यह उत्तर दिया कि यथावसर सरकार उस पर भलीभाँति विचार करेगी । सन् १८७३-७४ के विवरण में,शिक्षा-विभाग के डाइरेक्टर ने भी हिन्दी के प्रचार पर जोर दिया। उनकी यह सम्मतिथी कि उर्दूकेवल उन्हीं जगहों मेंपढ़ाई जाय जहाँ उसकी आवश्यकता या चाह हो और सर्वसाधारण की शिक्षा हिन्दी भाषा के द्वारा ही होनी चाहिए। सर्वसाधारण की प्रार्थना और शिक्षा-विभाग के डाइरेक्टर की सम्मति पर कोई ध्यान न दिया गया और सरकार ने यह स्पष्ट रूप से कह दिया कि हिन्दी का प्रचार कचहरियों में नहीं किया जा सकताऔर न उसके पढ़ने वालों को उत्साहित करने की आवश्यकता है, क्योंकि हिन्दी जाननेवालों की संख्या उर्दूजानने वालों से कहीं अधिक है। सरकार ने केवल यही नहीं कहा,बल्कि दो वर्ष उपरान्त सन् १८७७ ई. में यह आज्ञा दे दी कि जिसने उर्दू या फारसीमें एन्गलों वर्नाक्यूलर मिडिल परीक्षा न पास की हो वह किसी दफ्तर में दस रुपयों याउससे ऊपर कीनौकरी न पावे, चाहे उस दफ्तर में केवल अंग्रेजी की ही आवश्यकताक्यों न हो। इस प्रकार हार कर लोगोंने हिन्दी छोड़कर उर्दू पढ़ी । इस आज्ञा का प्रचारसन् १८९६ ई. तक रहा, जब सर एण्टनी मेकडौनल ने इसे रद्द कर दिया। पर २० वर्षतक सन् १८७७ की आज्ञा के पालन से जो विद्या के प्रचार तथा हिन्दी की उन्नति कीहानि हुई है उसका पूरा होना तब तक असम्भव है जबतक कि इसका उचित उपाय नकिया जाय| परन्तु यह बात दिखाई जा चुकी है कि हिन्दी के पढ़ने से कोई लाभ नहींहै। क्योंकि इससे जीविका-निर्वाह का ठिकाना नहीं लग सकता। इसलिये उर्दू के पढ़नेमें ही लाभ है। यह भी दिखाया जा चुका है कि उसी सिद्धान्त के अनुसार हिन्दी पढ़नेवालोंकी संख्या घटने लगी। सन् १८७७ ई. वाली आज्ञा से यह बात और भी बढ़ी। सन्१८७३-७४ की वर्नाक्यूलर मिडिल परीक्षा के लिये ४३४ बालकों ने उर्दू और १,३१५ने हिन्दी पढ़ी, अर्थात् हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या तिगुनी थी। और सन् १८९५-९६में २,८१४ बालकों ने उर्दूमें और ७८५ बालकों ने हिन्दी में परीक्षा दी, अर्थात् उर्दू पढ़नेवालों की संख्या चौगुनी हो गई।

जब हम परीक्षा के परिणाम पर ध्यान देते हैं तो यह दीख पड़ता है कि हिन्दीमें पास करने वालों की संख्या उर्दू वालों से अधिक होती है। यहाँ पर इस कथन की पूष्टि के लिये गत पाँच वर्षो की अवस्था नीचे दिखाते हैं।

 

 

                  उर्दू 

                हिन्दी

वर्ष

परीक्षा दी

पास हुए

प्रति सैकड़ा

परीक्षा दी

पास हुए

प्रति सैकड़ा

१८९१-९२

१८९२-९३ 

१८९३-९४

१८९४-९५

१८९५-९६

 

२,२२७

२,६८९

२,९६७

२,९३१

२,८१४

१,१२१

१,२५४

१,४२८

१,२०५

१,२४७

४१

४७

४८

४१

४४

६२८

७२४

७९२

८१४

७८५

३५१

४२६

४०६

३८६

४७४

५६

५९

५१

४७

६०

 

वर्नाक्यूलर मिडिल परीक्षा में व्याकरण तथा साहित्य को छोड़कर हिन्दी तथाउर्दूके सब ग्रन्थ एक से ही हैं। अतएव जब हिन्दी पढ़ने वाले अधिक पास होते हैं तोउससे यही सिद्धहोता है कि उस भाषा में सुगमता से विद्या उपार्जन कर सकते हैं।यह सब होने पर भी सरकार का ध्यान हिन्दी की ओर क्यों नहीं जाता, इसका कुछकारण समझ में नहीं आता। उर्दू के आदर और हिन्दी के अनादर सेकेवलयही परिणामनहीं हुआ कि केवल हिन्दी पढ़ने वालों को हठात्उर्दूपढाई जाय और इसमें उद्योग व्यर्थ नष्ट किया जाय, बल्कि इससे बड़ी भारी हानि तो यह हुई है कि पढ़ने वालोंकी संख्या घट गई। जिन अन्य प्रान्तों में वहाँ की देशभाषा का कचहरियों में प्रचार हैवहाँ पढ़ने वालों की संख्या दिनों दिन बढ़ती चली जाती है।

सबसे पहले प्रारम्भिक शिक्षा का प्रचार बम्बई और पश्चिमोत्तर प्रदेश में हुआ।बम्बई की जनसंख्या पश्चिमोत्तर प्रदेश से आधी है, पर वहाँ सन् १८७०-७१ में १,५९,६२८ बालक प्रारम्भिक स्कूलों में पढ़ते और यहाँ १५३,२५२, अर्थात् बम्बई से छ: हजार कम | इसके पहले और किसी प्रान्त में प्रारम्भिक शिक्षा के लिये नियमितरूप से कोई उद्योग नहीं हुआ था इसी कारण से यहाँ इतनी सफलता दीख पड़ती थी।पर जब सन् १८७०-७१ के उपरान्त अन्य प्रान्तों में भी प्रारम्भिक शिक्षा आरम्भ हुई तोयह देखा गया कि पश्चिमोत्तर प्रदेश प्रारम्भिक शिक्षा में सबसे पीछे रह क्या है, सरकारकी ओर से किसी प्रकार की ढिलाई नहीं हुई बल्कि प्रारम्भिक शिक्षा के लिये और भीअधिक उद्योग किया गया। उसका फल यह हुआ कि सन् १८७१ से १८८२ तकविद्यार्थियों की संख्या १,५३,२५२ से २,०४,५१२ हो गई। इसी ग्यारह वर्ष के अन्तर मेंअन्य प्रान्तोंमें बालकों की संख्या कितनी बढ़ी यह नीचे दिखाया जाता है।

प्रान्त का नाम

जनसँख्या

सन १८७०-७१ ई०

सन १८८१-८२ ई०

मद्रास

बम्बई

बंगाल

३,५६,३०,४४०

२,६९,६६,२४२

७,१३,४६,९८७

६८,२३७

१,५९,६२८

६,८५,४३

३,४०,२७८

३,१२,७७१

८,८०,९३७

 

एड्युकेशन कमीशन के वक्तव्य के अनुसार जनसंख्या के हिसाब से प्रतिसैकड़ा २.६ बालक बम्बई के, २.५ बंगाल के, २.२ मद्रास के और .८९ प्रति सैकड़ापश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध के प्रारम्भिक स्कूलों में शिक्षा पाते हैं। सन्१८८१ में हमारेप्रान्त की यह अवस्था थी। सन् १८९५-९६ में बालकों की संख्या मद्रास में ५,१०,०६३ बम्बई में ५,००,१२२ और बंगाल में १२,०६,६१९ हो गई; परन्तु अभागे पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में घटकर १,५५,५५२ हो गई, अर्थात्४८,९६० बालक कम होगए।

इन प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि बम्बई, बंगाल और मद्रास में प्रारम्भिक शिक्षा की सन्तोषजनक उन्नति हुई है। इन तीनों प्रान्तों की कचहरियों मेंवहीं की देशभाषाओंका प्रचार हैं। पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में प्रारम्भिक शिक्षा की उन्नति के स्थान पर पूरी अवनति हुई है और इन स्थानों की कचहरियों में देशभाषा और देशी अक्षरों के स्थान पर एक विदेशी भाषा और विदेशी अक्षरों का प्रचार है |

अब जरा बिहार तथा मध्यप्रदेश पर ध्यान दीजिए|जब सन् १८३९ ई. में सरकार ने यह आज्ञा दी कि कचहरियों और सरकारी दफ्तरों में फारसी के स्थान पर देशभाषा का प्रयोग हो तो उर्दूइस प्रान्त की भाषा समझकर प्रचलित की गई। परन्तुवास्तव में यहाँ की भाषा हिन्दी ही थी और अब भी है, जो नागरी या कैथी अक्षरों मेंलिखी जाती है, जब बंगाल के लेफ्टीनेण्ट गवर्नर सर जॉर्ज कैम्बल हुए तो उन्होंने अपनेशासनकाल का मुख्य कर्त्तव्यजनसाधारण मेंविद्या फैलाना बनाया और इसी उद्देश्य सेसन् १८७२ ई. में चार लाख रूपये का व्यय स्वीकार किया। पर उनको यह अनुभव हुआ कि जब तक उस देश की भाषा और लिपि का प्रचार कचहरियों और दफ्तरों में न होगा तब तक विद्या का यथेष्ट फैलाना सम्भव नहीं है। अतएव उन्होंने आज्ञा दी कीकेवल अर्जियों को छोड़कर और सब सम्मन, नोटिस आदि हिन्दी में लिखे जायं, परन्तुराज्य कर्मचारियों की दया से कई वर्ष तक इस आज्ञा का पालन न हुआ। अन्त में सरऐशले ईडेन् के समय में इस बात पर सरकार का ध्यान पुन: दिलाया गया औरतदनुसार जनवरी सन् १८९१ ई. से पटना और भागलपुर कमिश्नरी में हिन्दी का हीप्रचार है। इस न्याययुक्त और आवश्यक सुधार का फल अत्यन्त सन्तोषजनक हुआ है,क्योंकि ३१ मार्च सन् १८७२ ई. में बिहार के प्रारम्भिक स्कूलों में केवल ३३,४३०बालक थे और सन् १८९५-९६ के अन्त में २,६०,४७१,अर्थात् आठगुने हो गए|

मध्यप्रदेश के हिन्दी-भाषी स्थानों में सन् १८७२ ई. तक फारसी का प्रचारथा। सन् १८७२ ई. मेंभारत सरकार ने यह आज्ञा दी कि नागरी अक्षरों का प्रचार हो,परन्तु राज्य कर्मचारियों की अपार दया से सन् १८८१ ई. तक इस आज्ञा का प्रत्यक्षफल न देख पड़ा। इस वर्ष जुडिशल कमिश्नर ने चीफ कमिश्नर के आदेशानुसार यहआज्ञा दी कि अर्जीदावे हिन्दी में लिखे जाया करें तथा डिग्री,हुक्म, फैसले आदि हिन्दीमें लिखे जायँ, और जो मनुष्य शीघ्रता तथा शुद्धता से हिन्दी न लिख-पढ़ सकता हो,वह-नौकर न रक्खा जावे। इस आज्ञा का पालन अब पूर्ण रीति से हो रहा है, और शिक्षापर इसपरिवर्त्तन का प्रभाव अच्छा पड़ा है। फलस्वरूप सन् १८८१ ई. मेंप्रारम्भिकस्कूलों में जहाँ ७४,५२९ विद्यार्थी थे, वहाँ १८९५-९६ के अन्त में १,१७,८९६, अर्थात्लगभग ४३,००० अधिक हो गए; पर पंजाब में,  जहाँ विश्वविद्यालय और आर्यसमाज प्रारम्भिक शिक्षा के लिये पूर्ण उद्योग कर रहे हैं, गत १५ वर्षों में केवल १६,०००विद्यार्थी बढ़े और पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में ४९,००० घट गए। इसका कारण केवल यही है कि इनदोनों प्रान्तों की कचहरियों और सरकारी दफ्तरों में देशभाषा औरदेशी अक्षरों के बदले फारसी अक्षरों तथा उर्दू भाषा का प्रचार है।

और जगहों को जाने दीजिए। आप इसी प्रान्त के अन्तर्गत कुमाऊँ कमिश्नरी पर ध्यान दीजिए। इस प्रान्त में प्रारम्भिक शिक्षा की अवनति का कारण लोग यह बतलाते हैं कि किसान लोगोंकी रुचि इस ओर नाममात्र को भी नहीं है। ठीक है। पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध सबकमिश्नरियों में कुमाऊँ से बढ़कर किसानों की बस्ती और कहीं नहीं है। वहाँ ८३.७ प्रति सैकड़ा किसान हैं | कुमाऊँ से बढ़कर गरीब कमिश्नरी भी दूसरी नहीं है | अतएव शिक्षा देने में यहाँ जितनी कठिनता हो सकती है उतनी किसी अन्य स्थानमें कदापि सम्भव नहीं है; परन्तु प्रारम्भिक शिक्षा में जितनी सफलता सरकार को यहाँ प्राप्त हुई है उतनी और कहीं नहीं देखी जाती। यह ऊपर देखाजा चुका है सन् १८३० और १८७४ के बीच में जब पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवधभर में बालकोंकी संख्या दूनीभी न हो सकी थी,कुमाऊँ में छ:गुनी हो गई और अब तक यही अवस्था है। इसका श्रेय केवल कचहरियों में नागरी अक्षरों के प्रचार को है। आश्चर्य तो यह है कि एक ही प्रकार की शिक्षा पश्चिमोत्तरप्रदेश और अवध में दी जाती है, पर जितनी सफलता कुमाऊँ के गढ़वाल में दिखाई देती है उतनी और स्थानों मेंक्यों नहीं दीख पड़ती?

जब एड्युकेशनल कमीशन नियत किया गया तब अल्मोड़ा के श्री बडेन् ने एकलेख कमीशन के विचारार्थ छपवाया था। इस लेख में उन्होंने यह दिखाया था कि हिन्दीही उत्तर भारतवर्ष में हिन्दुओं की मातृभाषा है, उर्दूनहीं, और उनको समझाने तथा उनकेहृदय पर प्रभाव जमाने का सर्वोत्तम साधन यही है। उनका कहना है कि तबतकसफलतापूर्वक विद्या का प्रचार नहीं हो सकता है और न उससे कुछ लाभ ही मिल सकताहै जबतक कि यहाँ की ही देशभाषा का पूर्ण रूप से आदर न हो और उससे बिनाप्रतिबन्ध कार्य न लिया जाय।क्योंकि यह बात सिद्ध है कि विद्या का वास्तविक औरउत्तम प्रचार केवल पढ़ने वालों की मातृभाषा द्वारा ही होता है। अतएव इस बात को स्वीकार करके उसके अनुकूल कार्य करने में विलम्ब करना न्याय से दूर भागना, विद्याके प्रचार को रोकना और भारतवासियों की उन्नति में बाधा डालना है। राजा शिवप्रसादने भी इसी आशय की साक्षी एड्युकेशन कमीशन में दी थी तथा हिन्दी के प्रचार पर जोरदिया था। और भी अनेक महाशयों ने हिन्दी के पक्ष मेंकहा था और अभ्यर्थनापत्र भी भेजेथे। इलाहाबाद के मेयो हॉल में कमीशन को अभिनन्दन-पत्र दिए गए थे। १९ अगस्त सन् १८८२ ई. के पायोनियर के अनुसार कमीशन के सभापति ने उसके सभासदों से कुछकहने को कहा। इस पर माननीय श्री सय्यद महमूद ने हिन्दी और उर्दूके विवादित विषयपर एक वकृत्ता दी जिसमें उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि प्रजावर्ग का अधिकांशहिन्दी के पूर्ण प्रचार के पक्ष में जान पड़ता है। यह विवाद हिन्दी और उर्दू भाषाओं कानहीं है,बल्कि नागरी (देवनागरी) और फारसी अक्षरों का है। इसके उपरान्त इस विषयपर दिए हुए बयानों और अभ्यर्थना-पत्रों के सम्बन्ध में कहा,और अन्त में यह कहा कियदि कमीशन पश्चिमोत्तर प्रदेश के स्कूलों में हिन्दी के अधिक प्रचार की सम्मति देगातोमैं उसका समर्थन करूँगा। इसके उपरान्त सभापति महाशय ने कहा कि हम लोग आपकेनिवेदनों पर पूर्ण विचार करके तब कुछ सम्मति देंगे।

ऊपर यह कहा गया है कि कमीशन ने अपने विवरण में लिखा है किपश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध के प्रारम्भिक स्कूलों में पढ़ने वालों की संख्या .८९ प्रति सैकड़ाहै। इस सिद्धान्त को स्थिर करते समय, जो-जो कारण प्रारम्भिक शिक्षा के प्रचार न होने के बताए जाते हैं उन पर कमीशन ने पूरी तरह से विचार किया | वे कारण ये हैं- (१) किसानों की दरिद्रता, (२) हल्काबन्दी स्कूलों का तहसीली स्कूलों की नकल करना, ( ३) देशी स्कूलो पर ध्यान न देना और (४) हिन्दी के स्थान पर उर्दूका प्रचार। कमीशन ने इन कारणोंपर इस प्रकार से विचार किया: (१)-प्रथम कारण ठीक तथा सन्तोषजनक नहीं है, क्योंकि बम्बई में किसान फीस देकर पढ़ते हैं और पश्चिमोत्तर प्रदेश में बिना फीस लिए शिक्षा दी जाती है, (२) दूसरा कारण उन्हेंउचितन जान पड़ा और (३) तीसरे कारण पर कमीशन ने पूर्ण रूप से विचार किया।कमीशन के विवरण में लिखा है कि ऐसा जान पड़ता है कि जिस नीति का योग श्रीटॉम्सन ने कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स की सहानुभूति के साथ कियाथा, उस नीति केप्रतिकूल कार्य हुआ है। कई देशी स्कूल सरकार के अधीन नहीं किए गए। और गत वर्षो में शिक्षा-विभाग भी उन्हेंकुछ सहायता नहीं दी गई और न वे उत्साहित ही किएगए। तो भी उनमें से अधिकांश लोग अपने बालकों की शिक्षा के लिये द्रव्य व्यय करसकते हैं। जिन्हेंऐसा करने का बल भी है वे अब तक देशी स्कूलों (पाठशाला, मकतबआदि) के पक्ष मेंहैं। जो लोग शिक्षा-विभाग के नियमानुसार अपने बालकों को पढ़ानाचाहते हैं और जो अपने बालकों को घर का काम छुड़ाकर पढ़ने के लिये अवकाश देसकते हैं, उन पढ़ने वालों की संख्या सीमा तक पहुँच गई है। बम्बई प्रान्त मेंडिपार्टमेण्टल स्कूलों की आवश्यकता उनमें बालकोंकी बृद्धि से ही सिद्ध है; परन्तुपश्चिमोत्तर प्रदेश के हल्काबन्दी स्कूलों में ऐसी उन्नति नहीं दीख पड़ती। ............यहाँभी देशी स्कूलोंपर ध्यान न दिया जाता तो सन् १८७१ से ८२ के बीच में पश्चिमोत्तरप्रदेश में प्रारम्भिक शिक्षा की उतनी ही उन्नति होती जितनी भारतवर्ष के अन्य प्रान्तों मेंहुई है; परन्तु प्रजा के ध्यान न देने से टॉम्सन महोदय की नीति का अनुसरण नहीं कियागया।" कमिश्नर लोग अपने विवरण के उन्नीसवें पृष्ठ में लिखते हैं कि सन्१८५०में जो नियम स्थिर किए गए थे उन्हीं के अनुकूल चार-पाँच वर्ष तक काम हुआ। यहसम्भव है कि देशी स्कूलों को उपयुक्त सहायता न दी गई हो। परन्तु इनस्कूलों कीउन्नति पर ध्यान देकर प्रान्तीय सरकार ने यह स्थिर किया है कि वह अत्यन्त असन्तोषजनक है और इसी से शिक्षा का ऐसा प्रबन्ध किया गया कि उसका पूरा-पूराअधिकार सरकार के अधिकार में हो। इस प्रकार जमीन्दारों की सहायता और सरकारीअफसरों के प्रबन्ध से मकतबों और पाठशालाओं के स्थान पर ग्राम स्कूलों (विलेजस्कूलों) का प्रचार हुआ और अन्त मेंकेवल इन्हीं के द्वारा प्रारम्भिक शिक्षा की उन्नतिपर सरकार ने ध्यान दिया। इसके अतिरिक्त देशी स्कूलों की शिक्षा की अन्य कोई उत्तमरीति हो ही नहीं सकती थी। देशी स्कूलों की उन्नति और बृद्धि तभी तक सम्भव है, जबतक देशी भाषा और लिपि का व्यवहार हो। जिन प्रान्तोंमें कचहरियों और दफ्तरोंमें देश-भाषा का प्रचार है वहाँ इन स्कूलों की वृद्धि हुई है और इन्हींके द्वाराकरोड़ोंबालक शिक्षा प्राप्त करते हैं। केवल पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध तथा पंजाब, इन्हीं दोप्रान्तों में देशीस्कूलों द्वारा शिक्षा फैलाने में सफलता नहीं प्राप्त हुई है, और ये ही ऐसेप्रान्त हैं जहाँ कचहरियों और दफ्तरों में देशवासियोंकी भाषा और लिपि का अनादरकर उर्दू भाषा तथा फारसी अक्षरों का आदर है। देशी स्कूलों को उत्साहपूर्वक बढ़ानेकी सम्मति तोनिस्सन्देह उत्तम थी; परन्तु जो अभी कहा गया है उससे यह स्पष्ट है कि सन् १८७१ से ८२ के बीच में देशी स्कूलों की उन्नति न होनेके कारण यह नहीं हैकि श्रीयुत् टॅाम्सन की नीति के प्रतिकूल कार्य हुआ और उसका त्याग किया गया,बल्कि जिस कारण से उस नीति के अनुसार कार्य करने में सफलता प्राप्तकरना हीअसम्भव था वह उर्दू का आदर और देश भाषा हिन्दी का तिरस्कार था |

अब यह स्पष्ट है कि साधारण प्रजा में विद्या का प्रचार कचहरियों में हिन्दीके प्रचलित होने के साथ-ही-साथ होगा। अतएव यह आज्ञा की गई थी कि एड्युकेशन कमीशन, जिसका मुख्य उद्देश्य प्रारम्भिक शिक्षा की जाँच करना और उसकी उन्नति केउपाय बताना था,यह सम्मति देगा कि कचहरियों और सरकारी दफ्तरों में उर्दूके स्थान पर हिन्दी का प्रचार किया जाय,पर दुर्भाग्यवश उन्होंने इस विषयपर कुछ भी नलिखा। पंजाब में प्रारम्भिक शिक्षा पर विचार कर वे लिखते हैं कि उर्दू अभी तकसरकारी कचहरियों की भाषा है और जबतक यह रहेगी तबतक प्रारम्भिक स्कूलों मेंउसकी वृद्धि अवश्य होगी। बहुत से लोग ऐसे हैं जो उर्दूके बदले हिन्दी का प्रचार होनाचाहेंगे; परन्तु उसका उतना ही सम्बन्ध राज्य प्रबन्ध से है जितना शिक्षा विषय से।अतएव यह एक ऐसी बात है जिस पर कमीशन अपनी सम्मति नहीं दे सकती। कमीशनने यह सम्मति दी कि म्युनिसिपल और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के स्कूलों में किस भाषा मेंशिक्षा देनी चाहिए,यह उन स्कूलों की प्रबन्धकारिणी कमेटी बोर्ड की सम्मति लेकरनिश्चय किया करे। गत पन्द्रह वर्षो के अनुभव से यह सिद्ध हो गया है कि यह सम्मतिनिरर्थक है और फिर इस अनुभव के होने तथा और प्रान्तोंमें प्रारम्भिक शिक्षा केइतिहास पर ध्यान देने से यह आशा  नहीं की जा सकती कि कोई स्कूल-कमेटी तबतकविद्या के प्रचार में कृतकार्य हो सकेगी जबतक कि देशवासियों की भाषा अर्थकरी न हो,अर्थात् जबतक उसके पढ़ने वाले उसकी सहायता से अपनी जीविका का प्रबन्ध न करसकें। और यह तबतक नहीं हो सकता जबतक सरकारी कचहरियों तथा दफ्तरों मेंहिन्दी का प्रवेश न हो। इस सिद्धान्त में किसी प्रकार की विचित्रता नहीं है। केवलपश्चिमोत्तर प्रदेश मेंही नहीं, बल्कि और-और देशों में भी लोंगों ने तबतक अपनी भाषाके अध्ययन में उत्साह नहीं दिखाया जबतक कि कचहरियों की भाषा विदेशी रही। इंग्लैण्ड के इतिहास से इस कथन की पुष्टि होती है। नॉर्मन लोगों की विजय से लेकरसन् १३६२ ई. तक फ़्रांसीसी भाषा में कचहरियों का काम चलता था। अतएव लोग उसीभाषा के सीखने में रुचि रखते थे, अंग्रेजी का प्रचार किया गया। तब से जो उन्नति उसभाषा की हुई है उसे सब लोग जानते हैं।

यद्यपि उर्दू और हिन्दी में उतना भेद नहीं है जितना अंग्रेजी और फ्रांसीसी में है, पर तो भी इतना भेद अवश्य है जिसमें इंग्लैण्ड के इतिहास पर ध्यान देकर हम शिक्षा ले सकते है। अतएव जबतक फारसी और अरबी के शब्दों से पूरित होकर तथा फारसी अक्षरों में लिखी जाकर उर्दूकचहरियों में उस निष्कण्टक राज्य पद पर प्रतिष्ठित रहेगी, जो वास्तव में ब्रिटिश राज्य की नीति के अनुकूल हिन्दी को दिया जाना चाहिए  (क्योंकि उसी नीति के अनुसार न्याय विचार करके पजाब और पश्चिमोत्तर प्रदेश कोछोड़कर सब प्रान्तोंमें सरकार ने देश-भाषा का प्रचार किया है) तबतक जनता मेंहिन्दी की विशेष उन्नति नहीं हो सकेगी और न विद्या और सभ्यता, प्रचार ही किसीप्रकार से सम्भव है।

गत २५ वर्षो में इस प्रान्त में जो विद्या की उन्नति हुई है उस पर ध्यान देनेसे बड़ा दु:ख होताहै, पर रेवरेण्ड बडेन् और श्री राजा शिवप्ररपादजी की सम्मति कीगम्भीरता स्पष्ट दीख पड़ती है। सन् १८७०-७१ के अन्त में प्रारम्भिक स्कूलों में बालकऔर बालिकाओंकी संख्या १,५३,२५२ थी और सन् १८९५-९६ के अन्त में १,६३,९१५,अर्थात् २५ वर्ष के बीच में केवल १०,००० विद्यार्थियोंकी संख्या बढ़ी। पर जब हमइस बात पर ध्यान देते हैं कि इस अवसर में जनसंख्या ५० लाख बढ़ गई तो विद्यार्थियों की १०,००० संख्या नाममात्र की रह जाती है। अस्तु, अब यह भी जान लेना उचित हैकि किन लोगों ने शिक्षा से लाभ उठाया है? इस विषय पर श्रीयुत् ग्राउस महोदय काकथन है कि आजकल स्कूलों में वे ही लोग पढ़ते हैंजिन्हेंसरकारी नौकरी करने की इच्छा रहती है, क्योंकि गाँवों के स्कूल यदि आज बन्द कर दिए जायँ तो ये लोग अपना काम किसी-न-किसी भाँति चला ही लेंगे। पश्चिमोत्तर प्रदेश में स्कूल जाने योग्यबालकोंमें से पढ़ने वालों की संख्या अधिक है। इसका कारण यही है कि आजकल नौकरी केलिये लोग विद्याध्ययन करते हैंऔर सरकारी नौकरी में बिना अंग्रेजी के काम चल नहींसकता, इसलिये स्कूलों से आजकल उन्हींलोगों को लाभ पहुँचता है जिनका सरकारी नौकरी से कोई सम्बन्ध हैया जो सम्बन्धकरना चाहते हैं। पर शिक्षा-विभाग का यहीएक उदेश्य नहीं है। इसका उद्देश्य सब लोगों को शिक्षा देना होना चाहिए और उसको ऐसी रीति निकालनी चाहिए जिससे वह अपने उद्देश्य मेंसफलता प्राप्त कर सके।

और प्रान्तोंकी अपेक्षा यहाँ शिक्षा में कितना कम व्यय होता है यह इस स्थानपर दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हमें इस बात की पूर्ण आशा है किसर एण्टोनी मैकडोनेल के समय मेंइस अभाव की भली प्रकार पूर्ति हो जायगी। यह बात लोगोंको भलीभाँति विदित है कि सरकार की यह बड़ी भारी इच्छा है कि प्रारम्भिक शिक्षा का अधिक प्रचार हो। उसकी पुष्टि के लिये सरकार की उस आज्ञा कोदेखिए जो शिक्षा-विभाग के सन् १८९४-९५ के विवरण पर दी गई है। सरकार की इच्छा पूर्ण होने का एक यही मार्ग है कि प्रजामात्र को शिक्षा प्राप्त करने में उत्साह हो।ज़बतक यह न होगा तबतक कितना भी द्रव्य क्यों न व्यय किया जाय प्रारम्भिक शिक्षा को वृद्धिहोनी असम्भव है। इस असाध्य कार्य को साध्य बनाने का उपाय देशी भाषाऔर लिपि का सत्कार करने के अतिरिक्त और दूसरी कुछ नहीं है। प्रति वर्ष इस बात का रोना सुनने में आता है कि अन्य प्रान्तों की अपेक्षा पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में प्रति बालक पर औसत व्यय अधिक पड़ता है। इसके प्रमाण में और प्रान्तों की अवस्था को देख लेना आवश्यक है | सन् १८९५-९६ में मद्रास प्रान्त में ४,३५,६१९ बालक सहायता-प्राप्त तथा असहाय स्कूलों में, और १,५६,२०० सरकारी स्कूलों में थे, परन्तु पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में १,५३,८०० बालक सरकारी स्कूलों में, और केवल १०,१७५ सहायता-प्राप्त तथा असहाय स्कूलों मेंपढ़ते थे। यह हाल केवल प्रारम्भिकस्कूलों का है। जो अवस्था बालकों की है वही अवस्था खर्च की भी है। बंगाल में१८९५-९६ में प्रारम्भिक शिक्षा के लिये ३२,४५,५४३ रुपए दिए गए, अर्थात् सरकार का व्यय प्रजा से छ:गूना अधिक हुआ, अस्तु। अब यह स्पष्ट है कि इस पश्चिमोत्तर प्रदेशकी इस अधोगति का कारण यही है कि शिक्षा फैलाने में प्रजा की और से उद्योग नहींहोता और न वह इस कार्य में सरकार की सहायता ही करती है। यही मत एड्युकेशनकमीशन ने दिया था, और यह ठीक भी है। राजा तथा प्रजा जब दोनों मिलकर विद्याफैलाने का उद्योग करेंगे तो अवश्य यथेष्ट परिणाम प्राप्त होगा। पर बात यह है कि प्रजाका उत्साह उस भाषा और उन अक्षरों की शिक्षा के लिये क्योंहोने लगा, जिसके कारणउन्हेंअसंख्य कष्ट उठाने पड़ते हैं? यदि उन्हें उनकी अपनी भाषा और लिपि के सिखानेका उद्योग होता तोउन्हेंभी सहायता देने में उत्साह होता। इसलिये जबतक सरकारदेशभाषा और देशी अक्षरों का यथोचित आदर न करेगी तबतक और प्रान्तोंकी अपेक्षायहाँ उसे अधिक व्यय करना पड़ेगा, और फिर भी यहाँ के रहनेवालों में पूर्ण रीति सेविद्या न फैलेगी।

अब इस विषय पर और कुछ कहने की आवश्यकता बाकी नहीं रह गई है। जोकुछ कहा गया है उससे यह स्पष्ट है कि नागरी के प्रचार के साथ-ही-साथ पश्चिमोत्तरप्रदेश तथा अवध की प्रजा में प्रारम्भिक शिक्षा का यथेष्ट प्रचार होगा। प्रजा में हिन्दू औरमुसलमान दोनों शामिल हैं, और इसी अर्थ की पुष्टि में ये प्रमाण दिए जाते हैं। इस लेखके प्रारम्भ में यह दिखलाया जा चुका है कि यहाँ की देशभाषा हिन्दी है और उस पर पुन:कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। सन् १८९१ की मनुष्य-गणना के अनुसार ४,६९,०५,०८५ लोग इस प्रान्त में बसते हैं। इनमें से ४,०३,८०,१६८, अर्थात् ८६.१ प्रति सैकड़ा हिन्दू,और ६३,४६,६५१, अर्थात् १३.५ प्रति सैकड़ा मुसलमान हैं। मनुष्य-गणना की रिपोर्ट सेयह भी प्रगट होता है कि प्रति चार मुसलमानों में से एक शहर में तथा तीन गाँवों में रहतेहैं। इस बात को सब लोग स्वीकार करेंगे कि गाँवों के मुसलमानों की भी वही भाषा हैजो हिन्दुओकी अर्थात्, हिन्दी। सन् १८८१ और १८९१ की मनुष्य-गणना के समयगणना करनेवालों की ओर से कहा गया था कि वे साधारण बोली के स्थान पर “हिन्दुस्तानी नाम लिखें, तथा श्रीयुत बेली ने अपने सन् १८९१ के विवरण में लिखा हैकि हिन्दुस्तानी शब्द के अन्तर्गत शहरोंकी उर्दूतथा गाँवों की हिन्दी है। इस नियम के अनुसार ४,६९,०५,०८५ लोगों में से ४,५८,८२,२६२ हिन्दुस्तानी बोलते थे। श्रीयुत बेन्स ने अपने विवरण में हिन्दुस्तानी शब्द का प्रयोग करना अस्वीकार किया और पश्चिमोत्तर प्रदेश की भाषा को हिन्दी ही नाम दिया। सन् १८७२ ई. में ४,३२,२०,७०५ मनुष्य यहाँ बसते थे, जिनमें से ४,२१,९३,००४ हिन्दी बोलते थे। इस वर्ष के विवरण में लिखा है कि शहरवालों में और उच्च श्रेणी के लोगों में उर्दूबोली जाती है,परन्तु यह सर्वसाधारण की बोली नहीं है। शहरों में और उच्च श्रेणी के लोगों में भी उर्दू तभी तक बोली जाती है, जब तक बोलने वाला किसी फारसीदाँ के पास रहता है। सबकी घरेलू भाषा हिन्दी ही है। शिक्षा-विभाग सन् १८९४-९५ के विवरण में श्री लुई महोदय लिखते हैं कि नित्यप्रति केव्यवहार में एक ही भाषा बोली जाती है, और वह केवल हिन्दी है। यदि यह भाषा अपनेदेशी अक्षरों में लिखी जाती तो हम लोगों को उर्दू तथा हिन्दी में कोई भेद न दिखाई देता| तब एक ही भाषा रही होती और इसमेंकेवल ऐसे विदेशी शब्दों का प्रयोग होता, जोउसमें अच्छी तरह से घुलमिल गए होते। परन्तु फारसी अक्षरों के प्रचार से यह न होनेपाया और साधारणभाषा में अरबी और फारसी के कठिन कठिन शब्द मिल गए, जिससे सर्वसाधारण के लिये उसका समझना कठिन हो गया। अस्तु, भारतवर्ष के प्रत्येक प्रान्त केमुसलमानों मे विद्या की कैसी उन्नति हुई है, यह नीचे दिखाया जाता है।

प्रान्त

सन् १८९१ की मनुष्य-गणना के अनुसार मुसलमानों की बस्ती

स्कूल जाने योग्य मुसलमानों की संख्या

प्राईमरी स्कूलों में मुसलमानों की संख्या

मुसलमान विद्यार्थियों की संख्या

मद्रास

मध्यप्रदेश

बम्बई

बंगाल

पंजाब

पश्चिमोत्तर

प्रदेश और अवध

२२,५०,३८६

३०,८४,७९

४३,९०,९९५

२,३४,३७,५९१

१,१६,३४,१९२

 

६३,४६,६५१

 

 

३३,७५,५७

४६,४२१

६,५८,६४९

३५,१५,६३८

१७,४५,१२८

 

९,५१,९९७

६३,७७३

८,००६

१,०६,३२९

३,७०,००७

५२,६०२

 

२२,६०३

९३,०८८

१०,५९०

१,४१,२३७

४,९४,२९४

१,२९,९४२

 

६९,४४७

 

मद्रास, बम्बई, बंगाल और मध्यप्रदेश में मुसलमान उस प्रान्त की भाषा औरअक्षरों को साधारणत: सीखते हैं, इसलिये उनमें विद्या की इतनी उन्नति है, परन्तु पंजांबतथा पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध में उर्दू भाषा का प्रचार है, और यही कारण है किमुसलमानों मेंभी विद्या का इतना कम प्रचार है। ऊपर जो दिखाया गया है, उससे यहस्पष्ट प्रगट होता है कि फारसी अक्षरों को दूर करने का उपाय केवल नागरी अक्षरों काप्रचार करना है। सन् १८९० में २,०४,९८७ मुसलमान ऐसे थे जो पढ़-लिख सकते थे।यदि खोज की जाय तो यह प्रगट होगा कि इनमें से बहुत से नागरी अक्षर पढ़ सकतेहैं, क्योंकि मुसलमान पटवारी और हिन्दूदुकानदार इन्हीं अक्षरों में अपना हिसाब रखतेहैं। पून: श्रीयुत् नैस्फील्ड ने एड्युकेशन कमीशन के सम्मुख कहा था कि अवध केस्कूलों में कैथी पढ़ने वालों का तिहाई हिस्सा मुसलमान है। अतएव अब यह सिद्ध हो गया, और इसमें किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं है कि नागरी अक्षरों के प्रचारसे मुसलमानों को किसी प्रकार हानि न होगी, बल्कि पूर्ण लाभहोगा|

कचहरियों और दफ्तरों में नागरी अक्षरों के प्रचार से बहुत लाभ होंगे, अर्थात्लोगों को न्याय प्राप्त करने में सुगमता होगी। वे स्वयं नोटिस,सम्मन आदि पढ़ तथालिख सकेंगे। यूरोपीय अफसरों को एक ही भाषा और एक ही अक्षर सीखने पड़ेंगे औरसबसे बढ़कर यह लाभ होगा कि विद्या का अधिक प्रचार होगा और लोग उन्नति करसकेंगे। आजकल यूरोपीय अफसरों को उस प्रान्त की भाषा सीखनी पड़ती है, जहाँ वेरहना चाहते हैं, और प्रारम्भ में उनको फौजदारी के मुकदमे दिए जाते हैं। इससे वेप्रतिदिन कचहरी में सुनी हुई बातों तथा भाषा को कुछ दिनों में समझने लग जाते हैं,पर शिकस्त: के भय से वे कचहरी के कागजों को नहीं पढ़ सकते, इसलिये दर्ख्वास्तोंआदि के समझने के लिये उन्हें अन्य राज्य कर्मचारियों की सहायता लेनी पडती है। पुन:वे साधारण बोल-चाल की भाषा को नहीं जानते, क्योंकि कचहरी में वे जिस भाषा को सुनते है, उसमें फारसी तथा अरबी के शब्द भरे रहते हैं। इससे जो हानि होती है वहस्पष्ट है। नागरी अक्षरों के प्रचार से यह असुविधा भी दूर हो जायगी। यूरोपीय अफसरभाषा और अक्षर को सुगमता से पढ़ सकेंगे और इससे राज्य प्रबन्ध में कोई त्रुटि न रहजायगी तथा प्रजा को सुख प्राप्त होगा।

ऊपर जो कुछ लिखा गया है, उससे यह स्पष्ट है कि न्याय की रक्षा औरशिक्षा के हित के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध कीअदालतों और सरकारी दफ्तरों में फारसी के स्थान पर नागरी अक्षरों का प्रचार कियाजाय| ऐसा करने में किसी को भी कष्ट न होगा, क्योंकि इस प्रान्त में प्रत्येक असिस्टेण्टमजिस्ट्रेट, कलेक्टर, असिस्टेण्ट कमिश्नर, डिप्टी कलेक्टर, नहर और जंगल केआफिसर, तहसीलदार तथा अवध के प्रत्येक मुन्सिफ़ को नागरी अक्षरों में लिखी हुईहिन्दी की परीक्षा देनी पड़ती है।

इसलिये इन लोगों को इस परिवर्त्तन से कोई कष्ट न होगा। हाँ, राज्यकर्मचारियों को अवश्य नागरी सीखनी पड़ेगी। यदि यह अक्षर सीखने पड़ें तो भी यहकोई ऐसी बात नहीं है जिसके लिये न्याय का पथ छोड़ा जाय, विद्या का प्रचार रोकाजाय, और एक अत्यन्त आवश्यक सुधार करने में विलम्ब किया जाय। सर अर्स्किन पेरी का कहना है कि बालक तीन मास में नागरी अक्षरों का पढ़नासीख सकते हैं। यदिपढ़े-लिखे लोग केवल एक घण्टा प्रतिदिन उसके लिये लगावें तो इससे भी कम समयमें उनको पढ़ना आ जायगा। हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम भाषा के परिवर्त्तनके लिये प्रार्थना नहीं कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में जो सरकार की आज्ञाएँ हैं उन्हींके अनुकूल कार्य होने से सब अर्थ-सिद्धि हो जायगी। केवल आवश्यक यह है किअदालतों की कार्रवाई नागरी अक्षरों में लिखी जाय। हिन्दुस्तान को भाषा हिन्दुस्तानी हो,जो प्रतिदिन की बोलचाल की भाषा से मिलती-जुलती हो, अर्थात् जिसमें न फारसीऔर अरबी के कठिन शब्द हों और न हिन्दी तथा संस्कृत के। केवल ऐसे ही शब्दों काउसमें प्रयोग हो जो अत्यन्त सरल और सब लोगों की समझ में आते हों। नागरी अक्षरोंके प्रचार से ऐसी भाषा का स्वत: व्यवहार होने लगेगा। इसके लिये उद्योग करने कीजरा-सी भी आवश्यकता न पड़ेगी।

शान्ति और सुख का फैलना तथा पाप और अपराध रोकना और घटानासरकार का बड़ा भारी उद्देश्य है, और इस बात को सभी स्वीकार करते हैं कि विद्या के प्रचार के साथ पाप और अपराधों की कमी होती है। यह प्रान्त शिक्षा-सम्बन्ध मेंसबसे पीछे है और अपराधों की गिनती मेसबसे आगे। इस बात को स्वयं सर एण्टनी  मेकडॉनेल साहब ने शिक्षा-विभाग के सन् १८९४-९५ के विवरणमें स्वीकार किया है|उस कथन की पुष्टि मेंकिसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। इतिहास से इसके अनेकदृष्टान्त मिलते हैं। इसलिये यह आवशयक है कि प्रारम्भिक शिक्षा का प्रचार हो जिससेपाप और अपराधों की कमी हो,तथा लोगों में बुद्धि और सभ्यता बढ़े। बार-बार यहाँके लोगों को अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं, जिससे यह आवश्यक जान पड़ता है कि वेअपनी अवस्था को सुधारें तथा अपने रहन-सहन में आवश्यक परिवर्त्तन कर अपने को समय के उस प्रवाह के साथ ले चलें जो किसी के रोके नहीं रुक सकता और जिसकासाथ एक बार छूट जाने से फिर वह हाथ नहीं आता। परन्तु इसके लिये उस विवेक कीआवश्यकता है जो बिना विद्या के प्राप्त नहीं हो सकता, और जिसके अभाव के कारण राजा और प्रजा दोनों असह्य दु:ख सहते हैं। इसलिये पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध कीप्रजा मेशिक्षा का फैलना इस समय सबसे आवश्यक कार्य है, और गुरुतर प्रमाणों सेसिद्ध किया जा चुका है कि इस कार्य में सफलता तभी प्राप्त होगी जब कचहरियों औरसरकारी दफ्तरोंमें नागरी अक्षर जारी किए जायेंगे । अतएव अब इस शुभ कार्य में जरा-सा भी बिलम्ब न होना चाहिए और न राज्य कर्मचारियोतथा अन्य लोगों के विरोध परकुछ ध्यान देना ही चाहिए।

हमें पूर्ण आशा है कि वे बुद्धिमान और दूरदर्शी शासक जिनके प्रबल प्रतापसे लाखों जीवों ने इस घोर अकाल रूपी काल से रक्षापाई है, अब नागरी अक्षरों को जारी करकेइन लोगोकी भावी उन्नति औरवृद्धि का बीज बोएंगे, और विद्या केसुखकर प्रभाव के अवरोधों को अपनी क्षमता से दूर करेंगे,जिससे इस दीन देश केवासी सदा सर्वदा के लिये ब्रिटिश राज्य के ऋणी रहकर उसका यश गावें और अपने को धन्य मानें।

 

Mahamana Madan Mohan Malaviya